कुराली गांव के जिस स्कूल में करंट से बच्चे की जान गई थी, उसे मजिस्ट्रेट जांच में घेर बता दिया गया है। समाचारपत्रों और ग्रामीणों के बयानों को भी नकार दिया गया है। पहले पुलिस ने विवेचना में खेल कर दिया था, अब मजिस्ट्रेट जांच पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। मजिस्ट्रेट ने यह भी कहा है कि मृतक के परिजनों ने बयान भी दर्ज नहीं कराए हैं। सवाल उठता है कि बयान लेने की कोशिश क्यों नहीं की गई।
ये है मामला
जानीखुर्द स्थित गांव कुराली निवासी रचित उर्फ लक्की पुत्र राजेश कुमार गांव के ही एम पब्लिक स्कूल में कक्षा एक में पढ़ता था। 18 मई की सुबह रचित अपनी बड़ी बहन नंदिनी के साथ स्कूल की नल पर पानी पीने गया था। नल में करंट आने की वजह से बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई। नंदिनी गंभीर रूप से झुलस गई थी। घटना के विरोध में आक्रोशित ग्रामीणों ने मेरठ-बागपत हाईवे पर जाम तक लगा दिया था। राजेश ने स्कूल प्रबंधक और उसके पुत्र के खिलाफ जानी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। ग्रामीणों ने आरोप लगाया था कि नल के ऊपर मोटर लगा हुआ था, जिसमें बिजली का नंगा तार लगा होने से करंट उतर गया था।
मजिस्ट्रेट जांच सौंपी
समाचार पत्रों में प्रमुखता से खबर प्रकाशित होने पर जिलाधिकारी ने इस घटना की मजिस्ट्रेट जांच अपर नगर मजिस्ट्रेट को सौंपी थी। अब वह एसडीएम सरधना हैं। जांच रिपोर्ट पांच जुलाई को डीएम कार्यालय में सौंपी गई। जांच रिपोर्ट अब प्रमुख सचिव गृह को भेजी जा रही है।
ये है जांच रिपोर्ट
एसडीएम सरधना ने जो जांच रिपोर्ट दी है उसके अनुसार जहां पर घटना हुई है, वहां पर रिहायशी घेर बना है। थाने में दर्ज रिपोर्ट में भी विवेचक ने स्कूल संबंधी किसी भी अभिलेख का जिक्र नहीं किया है। थानाध्यक्ष ने जो रिपोर्ट दी है उसके अनुसार रचित की मृत्यु पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सुबह पांच बजे से शाम पांच बजे के बीच हुई है। उसमें करंट का जिक्र नहीं है, बल्कि मौत का कारण सिर में चोट लगना बताया गया है। जांच अधिकारी ने लिखा है कि जहां घेर हुई वहां निर्माण चल रहा है, स्कूल होने का प्रमाण नहीं मिला है। समाचारपत्रों ने घटना को बढ़ा चढ़ाकर प्रकाशित किया था।
ये उठ रहे सवाल
एम पब्लिक स्कूल बगैर मान्यता के चल रहा था। यह पहले ही दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुका था। ऐसे में उसका रिकॉर्ड किसी कार्यालय में मिलना असंभव था। लेकिन घटना के बाद घटनास्थल को सील क्यों नहीं किया गया? वहां पर मौजूद साक्ष्यों को मजिस्ट्रेट ने जाकर क्यों नहीं देखा? यदि पीड़ित परिवार बयान दर्ज कराने नहीं आया तो मजिस्ट्रेट स्वयं बयान लेने क्यों नहीं गए? पुलिस विवेचना पर ही अधिकांश जांच रिपोर्ट क्यों आधारित रही? इन तमाम सवालों के बीच इस मजिस्ट्रेट जांच रिपोर्ट को लेकर सवाल उठ रहे हैं।