जिला अस्पताल के हालात अब सीएचसी से भी बदतर होते दिखाई दे रहे हैं। मरीज सामने होते हुए भी उसे भर्ती नहीं किया जा रहा। पैथोलॉजी लैब से लेकर अल्ट्रासाउंड और एक्सरे में जांच कराना आसान नहीं है। सभी जगह जांच के नाम पर वेटिंग चलती है।
डायलासिस मशीन एक साल से खराब पड़ी है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिला अस्पताल महज पर्चा बनाने व दवाई बांटे तक का काम हो रहा है। पुराने पर्चा काउंटर के पास दो दिन से पड़े व्यक्ति की हालत खराब है। वो मानसिक तौर पर बीमार दिखता है। वह अर्द्ध बेहोशी की हालत में कांप रहा है। जब अमर उजाला की टीम मौके पर पहुंची तो कुछ लोगों ने बताया कि कई बार चिकित्सालय के स्टाफ से शिकायत की जा चुकी है, लेकिन कोई सुनने के लिए तैयार नहीं है।
बाकी स्टाफ भी गायब है। वहीं अस्पताल में हालात ऐसे है कि यदि किसी मरीज को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में शिफ्ट करना है या फिर वार्ड से जांच कराने के लिए जाना है तो तीमारदारों को ही मरीज ले जाना पड़ता। जबकि नियमानुसार यदि कोई मरीज भर्ती हो गया है तो उसकी जांच कराने और शिफ्ट करने की जिम्मेदारी स्टॉफ की होती है।
जिला अस्पताल के पुराने दवा काउंटर के पास एक मरीज दो दिनों से लेटा हुआ है। उसकी हालत इतनी खराब है कि वो अपना नाम बताने में भी सक्षम नहीं है। सभी डॉक्टर और स्टाफ यहां से गुजरते हैं, लेकिन किसी का दिल इस मरीज के लिए नहीं पसीजा।
दोपहर के करीब पौने दो बजे दो लोग एक मरीज को सहारा देकर ओपीडी से ला रहे थे। पूछने पर एक ने बताया कि इनकी हालत इतनी खराब है कि वह खड़ा भी नहीं हो सकता। इस हालत में भी मरीज को न व्हीलचेयर मिली न ही स्ट्रेचर।
संजीव ने छोटे भाई अमित को भर्ती कराया था। डॉक्टरों से उसकी जांच करने के लिए कहा। संजीव दोपहर 1:12 बजे अस्पताल की पैथोलॉजी लैब में पहुंचा तो वहां मौजूद स्टाफ ने उसका सैंपल लेने से इनकार कर दिया। बताया गया कि 12 बजे के बाद कोई सैंपल नहीं लिया जाएगा। जबकि अस्पताल में मरीजों की ओपीडी दोपहर 2 बजे तक होती है।