- अंजुमन इर्तिका-ए-अदब-ए-उर्दू की नशिस्त, शायरों ने पेश किए अशआर
संवाद न्यूज एजेंसी
फलावदा। कस्बे में साहित्यिक संस्था अंजुमन इर्तिका-ए-अदब-ए-उर्दू ने एक नशिस्त का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के संयोजक मोहम्मद अरशद रिजवी और हाफिज मोहम्मद आकिब रिजवी रहे। उस्ताद शायर अनवार-उल-हक शादां ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
संस्था के अध्यक्ष मास्टर फैयाज अली नादिर ने संचालन किया। काव्य गोष्ठी का प्रारंभ हाफिज मोहम्मद दानिश ने ईश्वर की वंदना से किया। हाफिज महफूजुर्रहमान माहिर ने नात-ए-पाक पेश की। अनवार-उल-हक शादां ने कहा, गुफ्तार की रौ से नजर आते हैं फरिश्ते, किरदार की दहलीज पे शैतान से क्यों हो। मिर्जा हसीमुद्दीन हमदम ने पढ़ा, जाने क्यों आज बदली हुई-सी, मैं तुम्हारी नजर देखता हूं। मास्टर फैयाज अली नादिर ने अपनी रचना सुनाई, मौत तो इक दिन आनी है, नादिर तू घबराए मत। सैयद नायाबुद्दीन नायाब ने अपने अशआर में हौसले की बात कही। अब्दुस्समद साहिर ने मुल्क की तारीख पर अपनी कविता पढ़ी। चांद रिजवी चांद ने प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। डॉ. सलीम खान सलीम ने अपने अंदाज में शेर पढ़े।
निसार अहकर फरीदी ने रचना से श्रोताओं को गुदगुदाया। जफर अब्बास जफर ने कहा, सारे जहां में हो गए बदनाम हर तरफ, तुमको हमारा नाम मिटाने से क्या मिला। तनसीब रिजवी, अरशद रिजवी, फैसल रिजवी और हाफिज दानिश ने भी कविताएं सुनाईं।
शराफत अली, कारी मोहम्मद आरिफ और इमरान सैफी उपस्थित थे। मोहम्मद शब्बीर, अब्दुल कादिर रिजवी और मोहम्मद यासीन कुरैशी भी शामिल थे। हाफिज अय्यूब कुरैशी, सफवान रिजवी और हाफिज मुजम्मिल अंसारी भी मौजूद रहे। गय्यूर कुरैशी और एहसान सैफी सहित अन्य लोगों ने कार्यक्रम का आनंद लिया।