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Meerut News: गुरु बाबा फकीरादास की सैंकड़ों वर्ष पूर्व पुरानी मूर्ति मंदिर में स्थापित

Mon, 07 Oct 2024 02:38 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
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मिरगपुर में गुरू बाबा फकीरादास की प्राचीन अष्टधातु की मूर्ति दिखाते मंदिर के महंत बाबा कालूदास।
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सहारनपुर, देवबंद। आदर्श गांव मिरगपुर में गुरु बाबा फकीरादास की प्राचीन अष्टधातु की मूर्ति रविवार को उनकी सिद्धकुटी में विधि विधान के साथ स्थापित की गई। यह मूर्ति मुजफ्फरनगर के एक सराफ के पास मौजूद थी। जिसे उन्होंने 20 वर्ष साल पूर्व एक कबाड़ी से खरीदा था।
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मुजफ्फरनगर निवासी सराफ संदीप रस्तोगी रविवार को गुरु बाबा फकीदास की अष्टधातु की मूर्ति लेकर मिरगपुर गांव पहुंचे और उसे मंदिर के महंत बाबा कालूदास को सौंप दिया। संदीप ने बताया कि उन्होंने कबाड़ी से मूर्ति खरीदने के बाद कई बार उसे गलाने का प्रयास किया। लेकिन सफलता नहीं मिलने पर मूर्ति को अपने घर में रख लिया। कुछ दिन पूर्व उनके सपने में बाबा आए और मूर्ति को उसके स्थान पर पहुंचाने को कहा।
अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है। वहीं, इस मूर्ति को सिद्धकुटी से कौन व्यक्ति कब और कितने वर्ष पूर्व लेकर गया था इसकी जानकारी ग्रामीणों को भी नहीं है। रविवार को सिद्धकुटी में बाबा की इस प्राचीन मूर्ति को विधि विधान के साथ ग्रामीणों द्वारा स्थापित करा दिया गया। इस दौरान चौधरी विरेंद्र सिह गुर्जर, गजराज सिंह राणा, शकूरा प्रधान, रूपेंद्र गुर्जर, वरिष्ठ गुर्जर, विशाल पंवार, बिजेंद्र गुप्ता, शिवकुमार, मोहित व विक्की आदि मौजूद रहे।
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- लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज है मिरगपुर
देवबंद। मिरगपुर देवबंद तहसील का अकेला ऐसा गांव हैं, जिसका नाम लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज है। क्योंकि गुरू बाबा फकीरादास करीब 500 वर्ष पूर्व इस गांव में आए थे। उन्होंने ग्रामीणों को तामसिक वस्तुओं से दूर रहने की शपथ दिलाई थी। गांव के लोग मदिरा, सिगरेट, प्याज, लहसुन जैसी तामसिक वस्तुओं का बाबा द्वारा प्रतिज्ञा दिलाने के बाद से परहेज करते आ रहे हैं। प्रशासन द्वारा भी मिरगपुर गांव को शुद्ध शाकाहारी होने का प्रमाण पत्र दिया हुआ है। गांव में बाबा की सिद्धकुटी पर प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पहली दशमी तिथि को मेला लगता है। जिसे ग्रामीण उत्सव की तरह मनाते हैं। ग्रामीणों के सभी रिश्तेदार व चिर परिचित इस मेले में सिद्धकुटी पर आकर बाबा के दर्शन कर प्रसाद चढ़ाते हैं। मेले में देशी घी का हलवा व पेड़े का प्रसाद घर-घर तैयार होकर वितरित होता है।
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