मजिस्ट्रेट को नए सिरे से विचार का निर्देश
अदालत ने याची के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए मामले का नए सिरे से परीक्षण करें और यह तय करें कि प्रकरण में वास्तव में कौन सी एक धारा लागू होती है। इसके बाद ही नया आदेश पारित किया जाए।
क्यों साथ नहीं चल सकतीं दोनों धाराएं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के मामले में आरोपी की नीयत शुरुआत से ही गलत होती है। वह छल या गलत बयानी के जरिए पीड़ित से संपत्ति या लाभ प्राप्त करता है। दूसरी ओर अमानत में खयानत के मामले में संपत्ति पहले वैध रूप से और भरोसे के आधार पर आरोपी को सौंपी जाती है, लेकिन बाद में वह उस भरोसे को तोड़ते हुए संपत्ति का दुरुपयोग या हड़प लेता है।
अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत में भरोसा था तो मामला धोखाधड़ी का नहीं हो सकता और यदि शुरुआत से ही नीयत गलत थी तो उसे अमानत में खयानत नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि दोनों धाराओं को एक साथ लागू करना कानूनी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।