जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में गंभीर मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं खुद ‘वेंटिलेटर’ पर हैं। जिला अस्पताल के तीनों वेंटिलेटर ठप पड़े हैं। इन्हें सुधारने के लिए मैकेनिक बुलाए गए, लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में कोई गंभीर मरीज यहां आ जाए तो उसे वेंटिलेटर की सुविधा नहीं मिलेगी। जिला अस्पताल से उसे मेडिकल रेफर करने के अलावा और कोई व्यवस्था नहीं है।
मेडिकल कॉलेज में 24 वेंटिलेटर हैं, लेकिन इनमें से 19 ही चल रहे हैं, जबकि पांच खराब हैं। इन्हें भी सही कराने की कोशिश की गई, लेकिन ये ठीक नहीं हो सके। अब खराब पड़े वेंटिलेटर की नीलामी की जाएगी। जो 19 वेंटिलेटर हैं, उनमें से 13 इमरजेंसी के ट्रॉमा सेंटर में हैं, चार बच्चा वार्ड में और दो सर्जरी डिपार्टमेंट में हैं। अव्यवस्था के कारण वेंटिलेटर व्यवस्था होने के बावजूद यहां से भी अधिकांश गंभीर मरीजों को दिल्ली ही रेफर कर दिया जाता है। इसी साल जनवरी में वेंटिलेटर पर भर्ती रहे मरीजों में से सात मरीजों की तीन दिन के भीतर मौत हो गई थी। साथ ही लाइट जाने पर एंबू बैग से ऑक्सीजन देनी पड़ी थी। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में हर साल करीब 14 से 15 लाख मरीज आते हैं। इनमें से 50 हजार से ज्यादा भर्ती किए जाते हैं।
इमरजेंसी के 15 में से 12 मॉनिटर ठप
मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में 15 में से 12 मॉनिटर कई महीने से ठप हैं। जब तक मैनुअली न देखा जाए, यह पता नहीं चल पता है कि मरीज की हार्ट रेट कितनी है, ऑक्सीजन सेचुरेशन, टेंपरेचर और ब्लड प्रेशर कितना है। यह हाल उस मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी का है, जिसके लिए कई बार दावा किया जा चुका है कि इसे एम्स जैसा बनाया जाएगा।
यह है वेंटिलेटर
वेंटिलेटर एक ऐसी मशीन है जो उन मरीजों को सांस लेने में मदद करती है, जो खुद किसी कारण से सांस नहीं ले पाते हैं। इसके कई अन्य नाम भी हैं जैसे- ब्रीथिंग मशीन या रेस्पिरेटर या मैकेनिकल वेंटिलेटर आदि। अधिकांश रोगियों को गंभीर बीमारी के कारण वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है। इनकी अस्पताल के आईसीयू में देखभाल की जाती है। एक मध्यम स्तर का वेंटिलेटर की कीमत लगभग 4.75 लाख रुपये, जबकि मध्यम स्तर के वेंटिलेटर में लगभग 7 लाख रुपये खर्च होते हैं। उच्च स्तर के वेंटिलेटर की लागत लगभग 12 लाख रुपये है।
गरीबों के लिए बेहद मुश्किल है खर्च उठाना
सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा निशुल्क होती है, लेकिन यदि इसे निजी अस्पताल में कराएं तो यह गरीबों के लिए बेहद मुश्किल होता है। अस्पताल के प्रकार के आधार पर एक मरीज को वेंटिलेटर पर रखने की प्रतिदिन का खर्च चार हजार से 10 हजार रुपये तक आता है। इसमें आईसीयू, दवा और अन्य शुल्क अलग होते हैं।
शासन से किया जा रहा पत्राचार
खराब पड़े वेंटिलेटर को ठीक करने के लिए जरूरी प्रक्रियाएं की गईं, लेकिन वह ठीक होने की स्थिति में नहीं हैं। नए वेंटिलेटरों के लिए शासन से पत्राचार किया जा रहा है। फिलहाल ऐसे मरीजों को जिन्हें वेंटिलेटर की जरूरत है, उन्हें मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। -डॉ. पीके बंसल, प्रमुख अधीक्षक, जिला अस्पताल
ठीक होने की स्थिति में नहीं
जो वेंटिलेटर खराब पड़े हैं, वह ठीक होने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी जल्द ही नीलामी कराई जाएगी। साथ ही जरूरत के हिसाब से शासन को डिमांड भेजी जाती रहती है। जो वेंटिलेटर अस्पताल में चल रहे हैं, उनमें यदि खराबी आती है तो उन्हें ठीक करा लिया जाता है। -डॉ. धीरज राज, सीएमएस, मेडिकल कॉलेज