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हौसले के दम पर जीती हीमोफीलिया की ‘जंग’

Wed, 20 Jul 2016 02:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
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अंकित मित्तल - फोटो : अमर उजाला
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 हीमोफीलिया से पीड़ित परीक्षितगढ़ के अंकित मित्तल ने अपने हौसले के दम पर बड़ा काम कर दिया। गंभीर बीमार के साथ ही वह पांच साल तक सिस्टम से भी लड़े। उनकी मेहनत रंग लाई। हीमोफीलिया का इलाज मेरठ मेडिकल कॉलेज में भी शुरू हो गया। विदेश से आने वाले इंजेक्शन की डोज बाजार में दस हजार की मिलती थी, निशुल्क लगवाने के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। इमरजेंसी में उन्हें काफी दिक्कत होती थी। लेकिन 2013 से मेडिकल कॉलेज में यह दवा मिलनी शुरू हो गई। हालांकि बजट न मिलने के कारण कभी-कभी दवा खत्म हो जाती है। अंकित और इस बीमारी से पीड़ित लोग दबाव बनाकर बजट का इंतजाम करा लेते हैं।

ये है हीमोफीलिया
यह वंशानुगत बीमारी है, जिसमें रक्त स्राव होने पर रुकता नहीं है। खून में थक्का जमाने वाला फैक्टर नहीं बनता है। बाह्य चोट लगने पर रक्त स्राव इतना खतरनाक नहीं होता, जितना शरीर के अंदर होने वाला खतरनाक होता है। जोड़ों में सूजन पैदा करने के साथ ही उन्हें कमजोर कर देता है। मरीज शारीरिक रूप से इतना कमजोर हो जाता है कि वह चलना तो दूर खड़ा तक नहीं हो पाता। इसके अलावा असहनीय दर्द की पीड़ा से भी मरीज गुजरता है।
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विदेशी दवाई और महंगा इलाज
हीमोफीलिया बीमारी में फैक्टर 8 की डोज दी जाती है, जो विदेश से आती है। इसकी एक डोज की कीमत दस हजार रुपये है। अहम बात ये है कि यह डोज मरीज को कभी-कभी महीनों तक नहीं देनी पड़ती, लेकिन कभी-कभी हर सप्ताह देनी पड़ती है।

ऐसे लड़ी लड़ाई
अंकित बताते हैं कि फैक्टर 8 की डोज सिर्फ दिल्ली में उपलब्ध थी। वह वहां जाकर इसे लगवाकर आया करते थे। लेकिन आने जाने में बहुत परेशानी होती थी। पैसा भी खर्च होता था। दिसंबर 2008 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हीमोफीलिया क्लब की तरफ से आयोजित जनहित याचिका पर प्रदेश सरकार को इसके लिए अलग से सभी मेडिकल कालेजों को बजट देने का आदेश दिया। लेकिन मेरठ मेडिकल कॉलेज ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अंकित ने शासन स्तर पर शिकायत की, तो मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने 2010 में पत्र लिखकर भेज दिया कि उनके यहां हीमोफीलिया का कोई मरीज भर्ती नहीं हुआ है। अंकित ने इसकी लड़ाई शुरू कर दी। पत्राचार के साथ अपने साथ दूसरे हीमोफीलिया के मरीजों को भी जोड़ा। मेडिकल कॉलेज और कलक्ट्रेट में धरना प्रदर्शन शुरू किया। इसके चलते 2013 में मेडिकल कॉलेज को शासन ने बजट रिलीज कर दिया।

अभी भी परेशानी
अंकित का कहना है कि हालांकि अब लगभग फैक्टर 8 की डोज उपलब्ध रहती है, लेकिन कभी-कभी बजट के अभाव में यह समाप्त हो जाती है। क्योंकि यह डोज इमरजेंसी में मरीज को देनी पड़ती है, इसलिए शासन स्तर पर आज भी संघर्ष जारी है।
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दूसरे जनपदों के मरीजों को लाभ
अंकित के संघर्ष से मेरठ समेत दूसरे जनपदों के मरीजों को भी लाभ मिल रहा है। मेडिकल कालेज में बिजनौर, मुजफ्फरनगर, बागपत, हापुड़ के मरीज डोज लेने आते हैं। अंकित का कहना है कि उन्होंने सभी मरीजों का डाटा अपने पास रखा हुआ है, ताकि जरूरत पड़ने पर सब एकजुट हो जाएं।
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