हाशिमपुरा नरसंहार पर में दोषियों को सजा मिलने में 31 साल लग गए। पहला फैसला 2015 में 28 साल बाद आया था, जिसमें सुबूतों के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने सभी आरोपी पीएसी के 16 जवानों को बरी कर दिया था। घटना के समय गाजियाबाद के एसएसपी रहे विभूति नारायण राय की उस प्रतिक्रिया पर नजर डालते हैं, जो उन्होंने 2015 में कोर्ट से आरोपियों की रिहाई के बाद दी थी।
राय ने कहा था, ‘हाशिमपुरा का नरसंहार स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग (हिरासत में हत्या) की घटना है। इसके पहले जहां तक मुझे याद है, कभी इतनी बड़ी संख्या में पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर लोगों को नहीं मारा था। दरअसल भारतीय राज्य का कोई भी जिम्मेदार नहीं चाहता था कि दोषियों को सजा मिले। राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मीडिया- सभी ने 22 मई, 1987 से ही इस मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की थी। राय ही वह शख्स हैं जिन्होंने पीएसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी और 31 वर्षों तक इस पूरे केस के तमाम प्रयासों के साक्षी रहे।
राय सहज स्वीकार करते हैं कि भारतीय राज्य के विभिन्न अंग दोषियों को बचाने के लिए प्रयास करते रहे। सबसे पहला प्रयास सरकार के स्तर पर हुआ था। कांग्रेस शासित राज्य सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने कुछ ही घंटों में तफ्तीश सीआईडी से कराने के आदेश दे दिए थे।
यह विवेचना इकाई पहले दिन से ही दोषियों को बचाने के पक्ष में खड़ी रही। सीआईडी की केस डायरियां ऐसे लिखी गईं, जैसे बचाव पक्ष का वकील अपने दस्तावेज बनाता है। कुल 19 आरोपियों में सबसे वरिष्ठ ओहदेदार एक सब-इंस्पेक्टर था, जो बिना वरिष्ठ अधिकारियों की शह, अभयदान और मजबूत आश्वासन के इतने बड़े पैमाने पर लोगों को मारने जैसा कदम नहीं उठा सकता था। सीआईडी ने बेमन से छोटे ओहदेदारों के खिलाफ चार्जशीट लगाई और बड़े अफसरों को छोड़ दिया।
राय के दृष्टिकोण से इतर यह मामला सिर्फ पुलिस-प्रशासन और जांच एजेंसी का नहीं था। राजनेताओं ने भी इस मामले में आपराधिक चुप्पी अख्तियार की। जिस समय यह कांड हुआ, यूपी और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थीं और उसके बाद दोनों जगहों पर सरकारें बदलती रहीं, लेकिन किसी ने भी इस मामले को चुनौती के रूप में नहीं लिया।
खास तौर से उत्तर प्रदेश की सरकारों ने तो गंभीर लापरवाहियों से आरोपियों को दोषमुक्त होने में मदद की। इनमें लंबे समय तक मुलायम सिंह यादव का शासन भी शामिल है। वर्षों तक दोषियों को निलंबित नहीं किया गया, आरोपितों के खिलाफ अभियोजन में देरी की गई। गाजियाबाद न्यायालय में अभियुक्त पेश नहीं होते थे। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से यह मुकदमा दिल्ली की अदालत में आया भी तो काफी समय तक योग्य अभियोजक ही नियुक्त नहीं किया गया।
जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोड़ते। एक दु:स्वप्न से वे हमेशा आपके साथ चलते हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सीने पर सवार रहते हैं। हाशिमपुरा भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही अनुभव है।
22 / 23 मई सन 1987 की आधी रात दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गांव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकंडों के बीच टार्च की कमजोर रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच जीवन के सूत्र तलाशना और हर अगला कदम उठाने के पहले यह सुनिश्चित करना कि वह किसी जीवित या मृत शरीर पर न पड़े- सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है । रात लगभग साढ़े दस बजे मुझे इस घटना की जानकारी हुई।
शुरू में तो मुझे सूचना पर यकीन ही नहीं हुआ पर जब कलक्टर और दूसरे अधिकारियों के साथ मैं पहले घटनास्थल मकनपुर गांव की हिंडन नहर पर पहुंचा तब मुझे अहसास हुआ कि मैं धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य के सबसे शर्मनाक हादसे का साक्षी बनने जा रहा हूं।
मैं गाजियाबाद का पुलिस कप्तान था और पीएसी ने मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को मेरे इलाके में लाकर मार दिया था। इस घटनास्थल पर पहला जीवित बच निकलने वाला बाबूदीन हमारे हाथ लगा और उससे इस पूरी घटना की जानकारी मिली।
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