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सर्वप्रथम प्रभु मोह का ही क्षय करते है : ज्ञानमती माता जी

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32 मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा पिता विश्वसेन को भेंट देते हुए। - फोटो : MAWANA
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हस्तिनापुर। जंबूद्वीप में चल रहे भव्य पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में बुधवार को दीक्षा कल्याणक के वैराग्यमयी दृश्य प्रस्तुत किए गए। भगवान शांतिनाथ के गर्भ कल्याणक एवं जन्म कल्याणक के उपरांत भगवान को वैराग्य हो गया। पालकी में बैठकर भगवान द्वारा सहस्राम्रवन में जाकर दीक्षा लेने का दृश्य मंच पर प्रस्तुत किया गया। भगवान के दीक्षा संस्कार गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा किए गए।
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पूज्य माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि तीर्थंकर भगवान ऐसे महापुरुष होते हैं जिन्हें अपने जीवन में किसी को गुरु नहीं बनाना पड़ता। वे स्वयं में इतने ज्ञानी होते हैं कि ऋद्धिधारी मुनिगण भी उनके अवलोकन हेतु पधारते हैं। भगवान शांतिनाथ के जीवन में दीक्षा की यह घटना हस्तिनापुर नगरी में हुई थी। जब उन्होंने अपनी माता ऐरावती एवं पिता श्री विश्वसेन सहित समस्त कुटुंबजनों व राजवैभवों का त्याग कर मोक्ष का मार्ग अपनाया था। कार्यक्रम में बुधवार को राज दरबार लगाया गया। इसमें अलग-अलग देश के 32 हजार मुकुटबद्ध राजाओं के स्वरूप में 32 राजाओं द्वारा भगवान के समक्ष भेंट प्रस्तुत की गई। चूंकि भगवान ने राजपाट संभालने के पहले ही दीक्षा ग्रहण कर ली थी अत: मंच पर उन्हें वस्त्र आभूषणों से अलंकृत कर उनका पट्टाभिषेक किया गया। पुन: वैराग्य के क्षणों में पांचवें स्वर्ग से देवों ने आकर भगवान के वैराग्य की अनुमोदना की।
दीक्षा धारण की
सैकड़ों इंद्र, इंद्राणियों ने भगवान की पालकी उठाकर वन की ओर गमन कराया। जहां उन्होंने नंद्यावर्त वृक्ष के नीचे समस्त वैभवों का त्याग कर वस्त्र आभूषणों को उतारकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। दीक्षा संस्कारों के पश्चात भगवान का पंचमुष्टि केशलोच हुआ। जिसमें उनके केशों को पांच बार में निकालने का दृश्य दिखाया गया। इस अवसर पर भगवान को पिच्छी, कमंडलु भेंट किया गया। इससे पूर्व प्रात:काल नित्य पूजन एवं अभिषेक श्रद्धालुओं ने किया।
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आज होंगे भगवान का आहार के कार्यक्रम
पं. विजय कुमार जैन ने बताया कि आज भगवान का आहार एवं समवसरण की रचना के कार्यक्रम होंगे। रात्रि में सुंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गएग। इसमें अखिल भारतीय विराट कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इससे पूर्व सायंकाल में भगवान की मंगल आरती और इस अवसर पर गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की भी मंगल आरती की गई। समस्त कार्यक्रम प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के मार्गदर्शन एवं कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवींद्र कीर्ति स्वामी जी के निर्देशन में प्रतिष्ठाचार्य पं. विजय कुमार जैन एवं पं. दीपक जैन द्वारा संपन्न कराए गए।
मन की एकाग्रता से ही आत्मतत्व की उपलब्धि
तपकल, याणक महोत्सव में गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने धर्मसभा में कहा कि प्रभु मौन रहकर कठोर से कठोर साधना के महान उद्योग में संलग्न रहते हैं। इसलिए तप कल्याण को देव भी मनाते हैं और सारी सृष्टि मनाती है। यह तप बिन वाणी के भी प्रभावोत्पादक है। शरीर द्वारा कठोर तप करने से उन्मत्त इंद्रियां शांत हो जाती हैं। जितेंद्रिय व्यक्ति ही आत्मचिंतन कर सकता है। मन को वशीभूत कर लेने से समस्त इंद्रियां स्वत: ही निगृहीत हो जाती हैं। शास्त्रकारों ने इस मन को ही संसार के बंध व मोक्ष का कारण बताया है। अत: मन की एकाग्रता से ही आत्मतत्व की उपलब्धि होती है। मोह विजय का कार्य सरल नहीं है। कोई वीर, तपस्वी ही उसे संपादिक कर सकता है। सर्वप्रथम प्रभु मोह का ही क्षय करते हैं। अत: ज्ञान से पूर्व तप को विशेष महत्व दिया गया है। इसीलिए इंद्रगण भी स्वर्ग से आकर इस तप कल्याणक को धूमधाम के साथ मनाते हैं।

जम्बूद्वीप में चक्रयात्रा में शामिल पूज्य माताजी ससंघ। - फोटो : MAWANA

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