प्राचीन दिगंबर जैन बड़े मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत मंदिर
हस्तिनापुर। कस्बे के श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर में चल रहे समवशरण महामंडल विधान में बृहस्पतिवार को विधिवत मांगलिक क्रियाएं संपन्न कराई गई। मुख्य वेदी पर भगवान जिनेंद्र का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। समवशरण जिनालय में मंगलाष्टक के साथ विधानाचार्य पंडित आशीष जैन शास्त्री व पंडित आयुष जैन शास्त्री ने विधान की क्रियाएं कराई। भगवान मल्लिनाथ को वेदिका से पांडुकशिला पर विराजमान किया। शांतिधारा उमेश जैन ने सपरिवार की। शांतिधारा में मुकेश जैन व प्रवीण जैन ने सहयोग किया।
आचार्य ज्ञान भूषण महाराज रत्नाकर ने पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग पर प्रवचन करते हुए कहा कि त्याग की शिक्षा हमें प्रकृति से लेनी चाहिए। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड ग्रहण और हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। गाय घास आदि खा कर हमें दूध प्रदान करती है। वृक्ष अपने पत्तों को एक समय स्वयं छोड़ देता है। हम भी आहार करते हैं तो निहार होता है तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। अगर हम ग्रहण तो करते रहें और उसे छोड़े नही तो हम अस्वस्थ हो जाएंगे। इसी प्रकार से धन का अर्जन करने और वस्तुओं के संग्रह के मूल में राग है। जबकि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। जीवन में त्याग की महिमा सृष्टि के आरंभ से ही रही है।
जैन धर्म और जैन समाज दान शीलता का आदर्श उदाहरण है। सच्चा धनपति जोड़ने में नहीं छोड़ने में स्वयं को भाग्यशाली समझता है। धन की सार्थकता छोड़ने में है, जोड़ने में नहीं। कार्यक्रम को सफल बनाने में समस्त स्टाफ का सहयोग रहा।