- जर्जर भवन में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे चिकित्सक
संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। पंडित जवाहरलाल नेहरू के सपनों का शहर हस्तिनापुर प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है। कभी चंडीगढ़ की तर्ज पर विकसित होने का सपना संजोने वाले इस ऐतिहासिक कस्बे में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। वर्ष 1965 में स्थापित राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल आज भी अपनी स्थायी बिल्डिंग के लिए तरस रहा है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया यह अस्पताल मलेरिया विभाग के जर्जर भवन में संचालित हो रहा है। स्थिति इतनी दयनीय है कि भवन की छत से पानी टपकता है। सीमेंट उतर कर नीचे गिर गया है। हालात यह है कि छत के सरिया तक दिख रहे हैं और कभी भी छत ढह सकती है। जान जोखिम में डालकर यहां तैनात चिकित्सा कर्मी मरीजों का उपचार करने को मजबूर हैं। अस्पताल की इस बदहाली का ही नतीजा है कि कभी यहां रोजाना 100 से अधिक मरीज उपचार के लिए आते थे, जिनकी संख्या अब घटकर 30-40 तक सिमट गई है।
जिले के देहात क्षेत्र में यह एकमात्र राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल है। यदि समय रहते प्रशासन ने सुध नहीं ली तो यह महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह दम तोड़ देगा और हस्तिनापुर के लोग एक प्राचीन और प्रभावी चिकित्सा पद्धति से वंचित हो जाएंगे।
कागजों में ही उलझी जमीन की फाइलें
क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी द्वारा दो वर्षों से लगातार जिलाधिकारी को पत्र लिखकर अस्पताल के लिए भूमि आवंटन की मांग की जा रही है। तहसील से लेकर नगर पंचायत तक फाइलें दौड़ रही हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला। प्रशासनिक उदासीनता के कारण अस्पताल निर्माण की योजना फाइलों और कागजों में ही उलझकर रह गई है।
विशेषज्ञ और स्टाफ की भारी कमी
हस्तिनापुर में कभी इस अस्पताल की ख्याति थी। यहां के विशेषज्ञ नाड़ी देखकर ही बीमारी की सटीक पहचान कर लेते थे, जिससे लोगों का इस पद्धति पर अटूट विश्वास था। लेकिन अब विशेषज्ञों के अभाव में मरीजों का विश्वास भी डगमगाने लगा है। वर्तमान में अस्पताल मात्र तीन कर्मचारियों एक चिकित्सक, एक वार्ड बॉय और एक स्वीपर के भरोसे चल रहा है। फार्मासिस्ट का पद लंबे समय से रिक्त है, जिससे दवाओं के वितरण और मरीजों के प्रबंधन में परेशानी हो रही है।
कोट...
राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल की बिल्डिंग पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। विभाग द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों से कई बार अस्पताल के लिए भूमि की मांग की गई है, परंतु अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं मिल सका है। -डॉ. केतन मंगवाल, चिकित्सा अधिकारी, राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल
पहले यहां दूरदराज से मरीज इलाज कराने आते थे। वैद्य नब्ज देखकर बीमारी पहचान लेते थे। आज अस्पताल की बदहाल हालत देखकर दुख होता है। -गोपाल शर्मा
जिस अस्पताल को बड़ा आयुर्वेदिक केंद्र बनना था, वह आज जर्जर भवन में चल रहा है। छत से प्लास्टर गिरता है, मरीज भी आने से डरते हैं। -दयाराम
एक चिकित्सक और सीमित स्टाफ के सहारे अस्पताल चल रहा है। फार्मासिस्ट का पद भी खाली है। नई बिल्डिंग और पर्याप्त स्टाफ के बिना व्यवस्था नहीं सुधरेगी। -जगदीश यादव
आज के मुकाबले पहले सुविधाएं बेहतर थीं। हस्तिनापुर में आयुर्वेदिक अस्पताल की स्थिति खराब है। इस हाल में यह बंद होने की कगार पर है। इससे लोगों को बड़ा नुकसान होगा। -श्रीबल्लभ