मेरठ। दस जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर कई बड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। बावजूद इसके आज भी भारत में हिंदी नकारी जा रही है। हिंदी भले ही बोलचाल में कम नहीं हो, लेकिन कामकाज की भाषा आज भी अंग्रेजी बनकर रह गई है। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर नवीन चंद लोहनी ने बताया कि मुझे कई बार विदेश में भारतीय और विदेशी नागरिकों ने सवाल किया कि अगर भारत में अंग्रेजी बोलने से ही काम चल जाता है तो लोग भारत जाने के लिए हिंदी क्यों सीखें ? और हिंदी क्षेत्र में ही लोग अंग्रेजी व्यवहार अपनाएं तो लोग हिंदी को क्यों महत्व दें।
प्रोफेसर नवीन चंद लोहनी ने कहा कि विश्व हिंदी दिवस पर मूल्यांकन करने का अवसर है, हम यह समझें कि आज विश्व में हिंदी की स्थिति क्या है? वैश्विक समाज हिंदी को कितनी गंभीरता से लेता है। यह जानना भी जरूरी है कि भारतीय समाज हिंदी को लेकर कितना सजग है। भाषा भाषियों की संख्या से देखें तो हिंदी दुनिया में प्रथम तीन बड़े भाषा भाषी समूहों में से एक है। चीनी और अंग्रेजी के साथ हिंदी का नाम आता है। हालांकि भारत की राजभाषा और बड़े क्षेत्र की भारतीयों की मातृभाषा होने के बावजूद आज हिंदी भारत में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में शिक्षण माध्यम के रूप में स्थापित नहीं हो पा रही है। न केवल निजी संस्थाओं अपितु सरकारी संस्थानों में भी अंग्रेजी के अनुकरण की होड़ है इस कारण भाषा के व्यावसायिक उपयोग न होने से उसके अध्ययन का विस्तार नहीं हो रहा है।
खतरे में हिंदी का अस्तित्व, जिम्मेदार हम खुद प्रो. प्रशांत
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग अध्यक्ष प्रो. प्रशांत कुमार का कहना है कि हिंदी का अस्तित्व खतरे में है। इसके लिए जिम्मेदार हिंदी भाषी लोग यानि हम खुद है। हिंदी भाषा की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है। आज यह दोयाम दर्ज की भाषा बनकर रह गई है। दूसरे देशों में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम हमसे कहीं ज्यादा है।