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मेडिकल में हो रही हाथों से सफाई

Thu, 28 Apr 2016 02:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
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मे‌डिकल कालेज - फोटो : अमर उजाला
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प्रदेश सरकार द्वारा सूबे के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मशीनों से सफाई किए जाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मेडिकल कॉलेज में केवल दो मशीनें हैं, जिनसे सभी वार्डों में सफाई होना असंभव हैं। उसमें भी एक मशीन खराब पड़ी है। 
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लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज में अगर इमरजेंसी को छोड़ दिया जाए तो करीब 19 अहम वार्ड हैं, जिनमें मरीजों का सबसे ज्यादा आना जाना लगा रहता है। जरूरत के हिसाब से हर वार्ड में एक मशीन होनी चाहिए लेकिन यहां एक ही मशीन है जो खराब पड़ी है। जबकि बीते साल शुरू हुई अत्याधुनिक इमरजेंसी को भी एक मशीन दी गई है, लेकिन वो कभी चलती हुई दिखाई नहीं दी है। 

सहारनपुर को एक मशीन
नव संचालित सहारनपुर मेडिकल कॉलेज में भी सफाई व्यवस्था मशीन द्वारा किए जाने का दावा किया गया है। जबकि हकीकत यह है कि वहां महज एक मशीन है। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ज्यादातर सफाई कर्मचारियों द्वारा हाथों से की जाती है। 
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ये है दावा 
सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि कानपुर, इलाहाबाद, मेरठ, कन्नौज, जालौन, अंबेडकरनगर, आजमगढ़, सहारनपुर और बांदा स्थित मेडिकल कॉलेज में मशीन द्वारा सफाई की जा रहा है। इन सभी मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में सफाई मशीन उपलब्ध हैं। जबकि बाकी मेडिकल कालेजों को मशीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसको लेकर टेंडर जारी किया जाना है। 

दो मेडिकल कालेजों में मशीन  
मेडिकल चिकित्सा शिक्षा से जुड़े एक शीर्ष अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया है कि सैफई और आरएमएल मेडिकल कॉलेज लखनऊ में ही मशीन द्वारा साफ सफाई की जा रही है। बाकी कालेजों में महज दिखावे के लिए एक दो मशीनें दी गई हैं। जिनसे एक दो वार्ड को ही साफ किया जा सकता है। जबकि हकीकत में सफाई हाथों से ही करानी पड़ रही है। 

आउटसोर्सिंग पर असमंजस
एक तरफ सरकार मशीन से सफाई कराने के दावे कर रही है, वहीं सरकार ही एक मई से आउट सोर्सिंग के जरिये साफ -सफाई कराने के मूड में है। इसके लिए आगरा, झांसी और गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में सफाई की व्यवस्था हाथ से किए जाने का हवाला देकर टेंडर छोड़ने की तैयारी है। इसको लेकर बीते दिनों संपन्न हुई वीडियो कांफ्रेंसिंग में काफी देर तक चर्चा हुई। वहीं अब आउटसोर्सिंग को लेकर भी एक पेच फंसा है। कालेजों को तर्क है कि सफाई के लिए मशीनें आउटसोर्सिंग के जरिये ही आएंगी या फिर कालेजों को खरीदने के लिए बजट दिया जाएगा।
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