मुस्लिम वोटों के नजरिये से सपा-कांग्रेस का गठबंधन कई सीटों पर अहम भूमिका निभा सकता है। वेस्ट यूपी की अधिकांश सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक की भूमिका में हैं। चुनाव में इसी समीकरण के सहारे यह गठबंधन वेस्ट यूपी में अपने आपको बनाए रखना चाहता है। वेस्ट यूपी में सपा के पास यादव वोटर नहीं हैं। ऐसे में दोनों दलों की एकजुटता का संदेश ही भाजपा और बसपा के मजबूत किलों में सेंध लगा सकता है। यह गठबंधन सहारनपुर जिले की सीटों पर प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
वेस्ट यूपी के बिजनौर, मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 40 से अधिक है। इसके अलावा मेरठ में 30 फीसदी से अधिक है। पिछले विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर सपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को अच्छे वोट मिले थे। इसके अलावा सहारनपुर जिले की कई सीटों पर लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस नेता इमरान मसूद का भी अच्छा प्रभाव है। पिछले विधानसभा चुनाव में मेरठ शहर सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी को 30 हजार से अधिक वोट मिले थे। मुस्लिम वोटों के बंटवारे में भाजपा के लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने सपा के रफीक अंसारी को हरा दिया था। सहारनपुर की बेहट सीट पर सपा प्रत्याशी दूसरे तो कांग्रेस का तीसरे स्थान पर रहा था। इसी तरह से नकुड़ सीट पर कांग्रेस के इमरान मसूद को सपा के फिरोज आफताब को मिले वोटों के कारण हार मिली थी। सहारनपुर देहात सीट पर बसपा के मुकाबले हारे कांग्रेस प्रत्याशी को 63 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और सपा के सरफराज खान ने लगभग 43 हजार वोट हासिल किए थे। सहारनपुर में लगभग हर सीट पर सपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों ने पिछले चुनाव में एक-दूसरे के वोट काटे थे। शामली सीट पर पहले और दूसरे नंबर पर कांग्रेस और सपा के प्रत्याशी ही रहे थे। इसके अलावा वेस्ट यूपी की कई सीटों पर सपा और कांग्रेस ने एक-दूसरे के वोट काटे थे। इससे माना जा रहा है दोनों दल साथ आकर वोटरों में मजबूती का संदेश देने की कोशिश में हैं।
बसपा का दलित-मुस्लिम समीकरण अहम
वेस्ट यूपी के अधिकांश जिलों में दलित-मुस्लिम वोटरों की संख्या निर्णायक है। भाजपा हिंदू वोटरों के ध्रुवीकरण की आस में दलितों में सेंध लगाने की कोशिश करती है तो सपा और कांग्रेस मुस्लिमों को अपने पाले में लाने का प्रयास करती हैं। कई सीटों पर कांग्रेस के कुछ परंपरागत वोटर भी हैं। अब सपा और कांग्रेस के नेताओं की यह कोशिश रहेगी कि वे ही भाजपा के मुकाबले में दिखें। हालांकि, मुस्लिम मतों के बंटवारे में भाजपा को भी कई सीटों पर लाभ मिल सकता है। बसपा यह दिखाना चाहती है कि भाजपा को उनका दलित-मुस्लिम समीकरण ही हरा सकता है तो भाजपा मुस्लिम मतदाताओं के बंटवारे और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के सहारे है। गठबंधन की असल चुनौती इन समीकरणों के बीच में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की है।
सुरक्षित सीटों पर रहेगी यह रणनीति
गठबंधन सुरक्षित सीटों पर मुस्लिम मतों के लिए ज्यादा दांव खेलेगा। इन सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी नहीं रहेगा और गठबंधन की कोशिश रहेगी कि यहां पर अपने प्रत्याशियों के पाले में मुस्लिम वोटरों को ला सकें। वेस्ट यूपी में सुरक्षित सीटों पर मुस्लिम मतों की संख्या अहम है। इन सीटों पर दलित मतदाताओं के बंटने की संभावना रहती है और दूसरी बिरादरियों के साथ मुस्लिम भी अहम भूमिका अदा करते हैं।