फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इंसाफ दिलाने में महत्वपूर्ण साबित हो रही फोरेंसिक जांच, 20 मामलों में हैरान कर देने वाले खुलासे

Thu, 27 Sep 2018 04:45 PM IST
मनु चौधरी, अमर उजाला, मेरठ
विज्ञापन
मेरठ न्यूज - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

गवाह और विवेचक के बयानों के साथ फोरेंसिक साक्ष्य न केवल अहम साबित हो रहे हैं, बल्कि पहले पड़ाव पर ही संगीन मामलों में ये सच और झूठ को भी अलग करने में सहायक हैं। इसी के चलते संगीन मामलों की विवेचना क्राइम ब्रांच की इंवेस्टीगेशन विंग को सौंपी जा रही है। अधिकारियों की मानें तो अच्छे संकेत यह हैं कि बारीक साक्ष्यों के दम पर केस सही तरीके से वर्कआउट हो रहे हैं। आने वाले समय में ऐसे साक्ष्य और भी महत्वपूर्ण साबित होंगे। 

विज्ञापन

 

हत्या के केस में पुलिस का फोकस मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर रहता है। अधिकांश मामले पैसा, अवैध संबंध या संपत्ति विवाद से जुड़े मिलते हैं। इन्हीं को लेकर रंजिश बनी रहती है। हत्या जैसी संगीन घटनाओं में मौके के कुछ साक्ष्य ऐसे होते हैं जो केस को खुलासे की तरफ ले जाते हैं। यदि चश्मदीद है तो पुलिस उसके बयान के आधार पर आगे बढ़ती है। चश्मदीद गवाह यदि पुलिस को मौके पर मिल जाए तो केस की तह तक जल्द पहुंचने में पुलिस को मदद मिलती है। यदि चश्मदीद नहीं है तो पुलिस वारदात के तरीके और घटनास्थल से मिले परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर काम करती है। 

यह भी महत्वपूर्ण
मरने वाले व्यक्ति का प्रोफाइल, किसी से विवाद या रंजिश, उसकी किस-किस से नजदीकी जांच के प्रमुख बिंदु होते हैं। किसी भी घटना के भौतिक व वैज्ञानिक साक्ष्यों पर भी काम किया जाता है। हत्या किस हथियार से से की गई? कैसे की गई? घायल है तो उसकी मेडिकल रिपोर्ट और हत्या में पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गहनता से जांच की जाती है। मोबाइल की कॉल डिटेल, सर्विलांस की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होती है। घटनास्थल पर खून के निशान और हथियार का बोर क्या है? इन्हें भी देखा जाता है। धोखाधड़ी के मामलों में फोरेंसिक एक्सपर्ट द्वारा डाक्यूमेंट्स का वेरीफिकेशन, हैंड राइटिंग और संबंधित विभाग के दस्तावेज अहम होते हैं। 

केस मजबूत करती है फोरेंसिक जांच रिपोर्ट

एसपी क्राइम डॉ. बीपी अशोक बताते हैं कि हत्या का खुलासा हो या फिर केस की विवेचना, फोरेंसिक साक्ष्य महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। गवाह झूठ बोल सकते हैं लेकिन फोरेंसिक साक्ष्य सही पाए जाते हैं। कुछ मामलों को खोलने में समय भले ही अधिक लगे लेकिन केस सही खुलता है। अब विवेचना में भी फोरेंसिक जांच रिपोर्ट केस को मजबूत कर रही है। कई बार जानलेवा हमले के मामले में चश्मदीद और घायल झूठ बोलकर रंजिशन केस दर्ज करा देता है। फोरेंसिक साक्ष्य पर जब काम किया जाता है तो पता चलेगा कि गोली कितनी दूरी से मारी गई है। कपड़े से पार होकर शरीर में घुसना महत्वपूर्ण साक्ष्य है। दोनों में अंतर आता है तो फोरेंसिक साक्ष्य में ही केस पकड़ा जाता है।

488 इंवेस्टीगेशन विंग में
क्राइम ब्रांच की इंवेस्टीगेशन विंग में इस समय 488 विवेचनाएं प्रचलित हैं। इनमें 13 इंस्पेक्टर और सात दरोगा लगे हैं। इंस्पेक्टर अरुण वर्मा का कहना है कि एक विवेचना में 15 दिन से लेकर दो साल तक भी लग जाते हैं। दस साल से वह विवेचनाओं पर ही काम कर रहे हैं। पहले गवाहों पर ज्यादा फोकस रहता था। लेकिन अब फोरेंसिक साक्ष्य वैज्ञानिक विधि को मजबूत कर रहे हैं। केस में जितनी जल्दी एफआईआर होती है वह केस उतना ही सत्यता की तरफ होता है। जब कई बार तहरीर बदलकर केस दर्ज हो तो केस घूम जाता है। ऐसे केस के खुलासे में पुलिस को बड़ी बारीकी से काम करना पड़ता है। 

दो साल में 20 से अधिक केस सही खुले
फोरेंसिक टीम के एक्सपर्ट जयप्रकाश बताते हैं कि साल 2017 और इस साल अभी तक फोरेंसिक साक्ष्यों पर 20 से अधिक सही केस खुले हैं। सदर बाजार में बीस लाख का कैश चोरी से लेकर परीक्षितगढ़ में हत्या की घटना ऐसे चौंकाने वाले केस थे जो खुले तो पीड़ित पक्ष भी हैरान में रह गया। परीक्षितगढ़ में लूट के बाद महिला की हत्या में उसके पति ने ही पत्नी की हत्या कराकर खुद को जांघ में गोली लगवा ली थी।

कहानी कामयाबी की-

फर्जी पाया एसिड अटैक
आईपीएस सतपाल सिंह का कहना है कि लालकुर्ती पैठ बाजार में इसी साल 28 फरवरी को दो महिला खिलाड़ियों पर तेजाब डाला गया था। जिसके बाद तेजाब कांड की लखनऊ तक गूंज हुई। इस मामले में खुद एसएसपी मंजिल ने मौके पर पहुंची। दौराला निवासी पीड़िता ने नामजद केस दर्ज करा दिया। इस चर्चित मामले की जांच भी एएसपी ही कर रहे थे। करीब चार दिन तक फोरेंसिक साक्ष्यों पर काम किया गया। कई शुरूआती साक्ष्य ऐसे मिले जिनसे लगा कि केस बनाने के लिए षड़यंत्र रचा गया है।

एक आरोपी सोनी को जेल भेज दिया गया। दूसरे नामजद युवक से पूछताछ की तो उसकी लोकेशन ही अपने घर पर थी। फोरेंसिक एक्सपर्ट से भी राय ली गई तो पूरा केस ही फर्जी पाया गया। जांच में सामने आया कि फर्श पर तेजाब डाला गया और शरीर के एक हिस्से के साथ उस पर लेटा गया था। महिला खिलाड़ी ने अपने प्रेमी को जेल से छुड़ाने के लिए पूरा षड़यंत्र किया था। डीजीपी ने भी इस केस के सही खुलासे की सराहना की और निर्दोष जेल जाने से बचे।
विज्ञापन

अलीपुर मोरना हत्याकांड

17 सितंबर को हस्तिनापुर का अलीपुर मोरना प्रकरण चर्चित रहा। 50 हजार के इनामी सोनू द्वारा पुलिस सुरक्षा में जोगेंद्र के घर पर हमला करना, जोगेंद्र के नौकर राजा की हत्या होना और भाई जॉनी को कथित रूप से छह गोलियां आरपार होने की बात बताना चौंकाने वाला रहा। पीड़ित जोगेंद्र पक्ष की गवाही मजबूत हो जाती लेकिन फोरेंसिक साक्ष्य में केस का झूठ पकड़ा गया। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर खुद एसपी देहात राजेश कुमार ने फोरेंसिक टीम के साथ मौके पर जांच की। पूरा फर्जीवाड़ा जोगेंद्र और जॉनी द्वारा रचा पाया गया। सोनू पक्ष को फंसाने के लिए नौकर की हत्या कर जॉनी ने शरीर पर गोलियों के निशान बनाए थे। हत्या और जानलेवा हमले में जोगेंद्र पक्ष ही जेल गया।

डॉक्टर से बनवाई चोट
पांच दिन पहले लालकुर्ती में मॉल रोड पर जफर को गोली लगने की सूचना कंट्रोल रूम पर मिली। पुलिस पहुंची तो दोस्तों ने अस्पताल में भर्ती करा दिया। एएसपी सतपाल सिंह ने फोरेंसिक टीम को बुलाया तो पता चला निशान गोली का नहीं, नुकीली वस्तु का है। मौके पर जांच की तो गोली नहीं चलने की बात सामने आई। 

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें

https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें