सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवाओं की भी अब सैंपलिंग की जाएगी। इसके लिए प्रदेश में लैबों का एक्सटेंशन किया जा रहा है, जिसके बाद हर दवा की जांच हो सकेगी। अभी तक सिर्फ लखनऊ की लैब में ही जांच करने की सुविधा थी, लेकिन अब मेरठ सहित प्रदेश में पांच अन्य जगहों पर भी दवा के सैंपल की कंप्लीट जांच हो पाएगी।
मेरठ में लैब का कंस्ट्रक्शन का काम तेजी से चल रहा है, जो दो से तीन माह में पूरा हो जाएगा। इसके बाद लैब के अंदर जांच से जुड़ी अत्याधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी। संभावना है कि अगस्त तक जांच की सुविधा शुरू हो जाएगी। इसके बाद एफडीए की तरफ से भरे जाने वाले दवाओं के सैंपल के साथ ही सरकारी खरीद की दवाओं की जांच की जा सकेगी। सरकार का प्लान है कि दो स्तर पर सैंपलिंग की जाएगी। जिस कंपनी से टेंडर लिया है, उससे दवा सप्लाई होने से पहले सैंपल लिया जाए। फिर दवा सप्लाई होने के बाद रैंडम तरीके से किसी भी अस्पताल से उसका सैंपल भरा जाए।
अगर रिपोर्ट में दोनों सैंपलों के अंदर कोई अंतर पाया जाता है तो कंपनी के ऊपर कार्रवाई होगी। वहीं सैंपल को भरने के बाद किसी भी लैब पर भेजा जा सकता है, जिससे सैंपल में किसी भी तरह की हेराफेरी होने की संभावना ना रहे। गौरतलब है कि दवाओं की क्वालिटी को लेकर अकसर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि मोटे कमीशन के खेल में घटिया क्वालिटी की दवायें खरीदी जाती हैं, जिससे मरीज को ठीक होने में टाइम ज्यादा लगता है या फिर बीमारी ठीक ही नहीं हो पाती है। सरकारी दवाओं की होगी जांच
मेरठ में एफडीए की अत्याधुनिक लैब बनने के बाद शुरू हो जाएगा काम
सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवाओं की भी अब सैंपलिंग की जाएगी। इसके लिए प्रदेश में लैबों का एक्सटेंशन किया जा रहा है, जिसके बाद हर दवा की जांच हो सकेगी। अभी तक सिर्फ लखनऊ की लैब में ही जांच करने की सुविधा थी, लेकिन अब मेरठ सहित प्रदेश में पांच अन्य जगहों पर भी दवा के सैंपल की कंप्लीट जांच हो पाएगी।
मेरठ में लैब का कंस्ट्रक्शन का काम तेजी से चल रहा है, जो दो से तीन माह में पूरा हो जाएगा। इसके बाद लैब के अंदर जांच से जुड़ी अत्याधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी। संभावना है कि अगस्त तक जांच की सुविधा शुरू हो जाएगी। इसके बाद एफडीए की तरफ से भरे जाने वाले दवाओं के सैंपल के साथ ही सरकारी खरीद की दवाओं की जांच की जा सकेगी। सरकार का प्लान है कि दो स्तर पर सैंपलिंग की जाएगी। जिस कंपनी से टेंडर लिया है, उससे दवा सप्लाई होने से पहले सैंपल लिया जाए।
फिर दवा सप्लाई होने के बाद रैंडम तरीके से किसी भी अस्पताल से उसका सैंपल भरा जाए। अगर रिपोर्ट में दोनों सैंपलों के अंदर कोई अंतर पाया जाता है तो कंपनी के ऊपर कार्रवाई होगी। वहीं सैंपल को भरने के बाद किसी भी लैब पर भेजा जा सकता है, जिससे सैंपल में किसी भी तरह की हेराफेरी होने की संभावना ना रहे। गौरतलब है कि दवाओं की क्वालिटी को लेकर अकसर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि मोटे कमीशन के खेल में घटिया क्वालिटी की दवायें खरीदी जाती हैं, जिससे मरीज को ठीक होने में टाइम ज्यादा लगता है या फिर बीमारी ठीक ही नहीं हो पाती है।