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...तो इसलिए वेस्ट पर सभी दलों का फोकस, आप भी जानें जरूर

Mon, 30 Jan 2017 11:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
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logo - फोटो : अमर उजाला
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विधानसभा चुनाव का पहला चरण वेस्ट यूपी में होने के कारण अधिकांश दलों के दिग्गज क्रांतिधरा और आसपास के इलाकों में दहाड़ने को तैयार हैं। इसके पीछे हर दल की अपनी रणनीति है तो उनके फार्मूलों की परख भी यहीं से होनी है। यह भी तय है कि पहले चरण के चुनाव के बाद पश्चिम से चली हवा का असर पूरब तक होगा। हर दल की कोशिश होगी कि वह हवा का रुख अपने पक्ष में कर ले। दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले मेरठ में नरेंद्र मोदी की रैली हुई थी। केंद्र सरकार के दो साल पूरे होने पर भी वेस्ट यूपी के ही सहारनपुर में प्रधानमंत्री ने बड़ी रैली की थी। सभी दल वेस्ट यूपी से बेहतर संदेश देकर ही प्रदेश के दूसरे हिस्सों के चुनावी रण में जाना चाहते हैं। सभी दलों के समीकरणों के हिसाब से भी पश्चिम की भूमि फायदेमंद साबित हो सकती है।
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नरेंद्र मोदी का आना ही अहम
लोकसभा चुनावों में हिंदुत्व की लहर पश्चिम से चली, तो दूसरे दल पूरे प्रदेश में साफ हो गए। सरकार के दो साल पूरे होने पर सहारनपुर में बेशक प्रधानमंत्री ने सिर्फ विकास की बात कही थी, लेकिन उनके मंच पर दूसरे नेताओं के भाषणों का मजमून हिंदुत्व ही था। इसके बाद कैराना प्रकरण को भी खूब गर्माया गया। अब मोदी की मेरठ और बिजनौर रैली उसी भावना को आगे बढ़ा सकती है। 

बसपा के फार्मूले की भी टेस्टिंग 
मोदी के रैली के कुछ दिनों बाद उसी मैदान में मायावती ने रैली की। वहां पर ताकत दिखाकर एक तरह से उन्होंने आने वाले चुनाव की तस्वीर पेश करने की कोशिश की थी। वह लगातार मुस्लिमों को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी ही भाजपा से सीधी लड़ाई में है। यही वजह है कि मायावती एक फरवरी को मेरठ में अपने समीकरण को मजबूत करने की कोशिश करेंगी।
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केजरीवाल भी आए थे मेरठ 
क्रांतिधरा और उसके आसपास की भूमि का सियासी लाभ उठाने के लिए ही अरविंद केजरीवाल नोटबंदी पर केंद्र सरकार को घेरने मेरठ आए थे। बेशक आम आदमी पार्टी (आप) यहां से चुनाव नहीं लड़ रही है, लेकिन दिल्ली में मेरठ के असर और भविष्य की सियासत के हिसाब से भी केजरीवाल ने क्रांतिधरा का रुख किया था।

रालोद के लिए स्थानीय सीटें अहम
बागपत और आसपास के जिले रालोद का गढ़ माने जाते हैं। यही वजह है कि चौधरी अजित सिंह ने बड़ौत में अपने मंच पर शरद यादव और एचडी देवगौड़ा को लाकर अपनी ताकत दिखाई। रालोद नहीं चाहता है कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद ध्रुवीकरण में उससे छिटका जाट वोटर फिर से भाजपा के पाले में आए। इसके लिए रालोद लगातार मुस्लिमों को साथ लाने का प्रयास कर रहा है। किसान राजनीति के सहारे दूसरी बिरादरियों को जोड़ने की भी मंशा है। पहले और दूसरे चरण का चुनाव रालोद के लिए भी अहम होंगे। 
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