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लीड::::: दूसरा चरण: जातीय गणित में उलझी मेरठ और बागपत की सीट

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दूसरा चरण: जातीय गणित उलझी मेरठ और बागपत की सीट
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- मेरठ में भाजपा-सपा में सीधी टक्कर, हाथी भी चलता रहा अपनी चाल
- मुस्लिमों में मतदान को लेकर दिखा स्पष्ट दृष्टिकोण

मेरठ। पहले चरण में मतदान प्रतिशत में गिरावट के बाद दूसरे दौर में लगभग वही स्थिति रही। मेरठ में 59.15 और बागपत में 52.74 प्रतिशत मतदान हुआ। बीते चुनावों के आंकड़ें इसकी तस्दीक करते हैं कि इन दोनों सीटों पर ज्यादा मतदान भाजपा के लिए अच्छे संकेत माना जाता रहा है। गौरतलब यह है कि इस बार चुनाव में मुद्दे हवा रहे, जातिगत समीकरण हावी नजर आए। मुस्लिमों का सपा को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रहा, जबकि बाकी में बंटवारा दिखा। मेरठ में बसपा का वोट बैंक असमंजस तो बागपत में बसपा की ओर लामबंद नजर आया। बहरहाल, मेरठ-हापुड़ और बागपत लोकसभा सीट पर भाजपा और सपा में सीधी टक्कर मानी जा रही है। मेरठ से अरीश रिजवी, सैयद यारिर रज़ा और बागपत से अंकित चौहान की रिपोर्ट...
मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम का सहारा मिला तो सपा प्रत्याशी एससी-मुस्लिम गठजोड़ का सहारे चुनाव लड़ा। मेरठ सामान्य सीट होने के बावजूद समाजवादी पार्टी नेे यहां दलित उम्मीदवार को उतारा। ऐसे में दलित समाज में सुनीता वर्मा की पकड़ मजबूत दिखी। मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट में पांच विधानसभा (शहर, दक्षिण, कैंट, किठौर और हापुड़) हैं। इन सभी में मुस्लिमों ने ज्यादातर सपा को प्राथमिकता दी। दलितों में सपा और बसपा में बंटवारा नजर आया। कई क्षेत्रों में शुरू में दलित हाथी की सवारी करते तो दिखे, लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ा उनका रुझान साइकिल की तरफ नजर आया। हालांकि शहर के मुकाबले देहात में एससी वोटर का रुझान बसपा की तरफ भी काफी रहा। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मतदान केंद्रों पर लंबी-लंबी कतारें उनके मतदान प्रतिशत बढ़ने की तरफ इशारा कर रही हैं। भाजपा खेमा दलित के बंटवारे को अपने लिए अच्छा मान रहा है।
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यह चुनाव 2014 और 2019 से थोड़ा है। 2014 में मोदी लहर के बीच मुजफ्फरनगर दंगे के चलते ध्रुवीकरण नजर आया था, जबकि 2019 में पुलवामा की घटना और पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने ध्रुवीकरण को बरकरार रखा था। 2019 में बसपा-सपा-रालोद का गठबंधन था, जिसके प्रत्याशी हाजी याकूब कुरैशी ने एससी-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र अग्रवाल को कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि शहर से देहात तक ध्रुवीकरण की हवा चलने से राजेंद्र अग्रवाल कम अंतर से जीत गए थे। इस बार भी भाजपा का परंपरागत वोट वैश्य, गुर्जर, जाट, ब्राह्मण, सैनी, कश्यप, प्रजापति, पाल, वाल्मीकि भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया है। बंटवारा त्यागी समाज के वोटों में भी हुआ। आमतौर पर यह वर्ग भाजपा का वोटर रहा है। मुस्लिम बहुल इलाकों में मत किसे देना है, इसे लेकर किसी तरह को कोई भ्रम नहीं था। 2019 के चुनाव में दलित वोट बैंक का एक हिस्सा भाजपा में भी गया था, जो इस बार नाममात्र माना जा रहा है।
कम वोटिंग ने प्रत्याशियों की बढ़ाई बेचैनी
मतदान कम होने की वजह से प्रत्याशियों में बेचैनी बढ़ना वाजिब है। मतदान कम होने के कई कारण बताए जा रहे हैं। यह कहना बेमानी होगा कि किसी दल के मतदाता कम निकले या किसी दल के लिए अधिक। क्योंकि शुक्रवार का दिन होने के कारण मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में डेढ़ से दो घंटे पोलिंग बूथ पर सन्नाटा रहा। वहीं बड़ी संख्या में किसान गेहूं की कटाई के लिए खेतों में रहे। कुछ लोग तीन दिन की छुट्टी होने के कारण पहाड़ी इलाकों में भी चले गए।
कैंट सीट तय करेगी हार-जीत का अंतर
पिछली बार की तरह इस बार भी सबकी निगाह कैंट पर है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां से एक लाख से लीड हासिल की थी। यही लीड भाजपा की जीत का कारण बनी थी। बहुजन समाज पार्टी बाकी चारों विधानसभा सीटें जीतने के बाद भी हापुड़-मेरठ सीट पर चुनाव हार गई थी। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की बात करें तो किठौर में विधानसभा क्षेत्र पर सपा और भाजपा में बराबर में टक्कर नजर आ रही है। किठौर में सपा और खरखौदा में भाजपा आगे मानी जा रही है। गांवों में मिलाजुला असर रहा। शहर विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल होने के कारण खूब साइकिल दौड़ी। मतदान भी जमकर किया। इनके मुकाबले यहां के हिंदू बहुल क्षेत्रों में मतदान केंद्रों पर कम भीड़ और कतारों से उनका मतदान प्रतिशत कम होने के संकेत मिल रहे हैं। मेरठ दक्षिण विधासनभा क्षेत्र में दलितों में विभाजन होने से बराबर की टक्कर देखने को मिली। कैंट विधानसभा क्षेत्र में पहले की तरह कमल खिला। भाजपा की साफ बढ़त नजर आई। सपा का भी आंशिक असर दिखाई दिया।
- बागपत में छपरौली पर टिकी नजर
बागपत लोकसभा सीट पर मतदान की स्थिति को देखते हुए चुनाव फंसता हुआ दिखाई दे रहा है। बागपत लोकसभा सीट के सभी विधानसभा क्षेत्रों का मिजाज अलग-अलग है। इनमें शामिल छपरौली को चौधरी परिवार का गढ़ कहा जाता है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में वर्ष 1937 से लगातार वहां चौधरी परिवार या उनकी पार्टी का कब्जा है। लोकसभा चुनाव में भी चौधरी परिवार को वहां से हमेशा तीस हजार से ज्यादा बढ़त मिलती रही है। हालांकि पिछले दो लोकसभा चुनाव से छपरौली में चौधरी परिवार की पकड़ कमजोर होती दिखी। मगर वह उस स्थिति में रहा, जब भाजपा सीधे टक्कर में रही। इस बार रालोद के साथ भाजपा थी तो वहां यह माना जा रहा है कि छपरौली से रालोद को बड़ी बढ़त मिल सकती है। अगर किसी जगह सपा को बढ़त मिलती है तो छपरौली ही उस बढ़त को दूर करेगी। इसलिए ही छपरौली से बड़ी बढ़त की उम्मीद जताई जा रही है। मगर वहां वोट प्रतिशत कम रहने से रालोद-भाजपा की चिंता भी बढ़ी है।
इसी तरह मोदीनगर से हर बार भाजपा को बढ़त मिलती रही है, मगर इस बार सपा प्रत्याशी ब्राह्मण होने से उस पर संशय बना हुआ है। यहां मिलने वाले पार्टियों को वोट भी हार-जीत तय करने में अहम होंगे।
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मोदीनगर से भाजपा को मिलती रही बढ़त, इस बार संशय
मोदीनगर विधानसभा सीट के वोटरों ने पिछले दो चुनावों से भाजपा का साथ दिया। मोदीनगर से वर्ष 2014 के चुनाव में करीब 68 हजार वोटों की बढ़त भाजपा को मिली थी, वहीं वर्ष 2019 में करीब 37 हजार वोटों की बढ़ती मिली थी। इस सीट पर ब्राह्मण वोटर काफी हैं। इसको देखते हुए ही सपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला था। वहां से वोटर पहले ही तरह भाजपा के नाम पर नल को बढ़त देते हैं या वहां बिरादरी के साथ ब्राह्मण गए हैं। हालांकि जिस तरह की बात सामने आ रही है तो वहां वोटर काफी बंटता हुआ दिख रहा है। कुल मिलाकर बागपत और छपरौली विधानसभा क्षेत्र पर हार-जीत का दारोमदार टिका है।
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