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गुटबाजी से कमजोर हो रहा किसान आंदोलन

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भारत बंद के आह्वान के बावजूद पश्चिमी यूपी में नहीं दिखी किसान आंदोलन की लहर
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टिकैत के बाद किसानों को नहीं मिला विश्वसनीय नेता
मेरठ। किसानों की आवाज बनने का दंभ भरने वाले किसान संगठनों की संख्या बढ़ रही है परंतु किसानों की आवाज कमजोर होती जा रही है। किसान संगठनों की बढ़ती संख्या और नेताओं की आपसी गुटबाजी से किसान आंदोलन कमजोर हो रहा है। भारत बंद के दौरान पश्चिमी यूपी में जिस तरह का किसान प्रदर्शन दिखा इसमें कहीं नहीं लगा कि ये बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की धरती है। उनकी एक आवाज पर लाखों किसान एकत्र हो जाते थे। इससे प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार तक हिल जाती थीं। अब न तो भाकियू में उतना दम दिख रहा है और न किसी किसान नेता में। इतने बड़े आंदोलन के बावजूद पश्चिमी यूपी का किसान सड़क पर नहीं आया है।
लंबे समय से किसान आंदोलन और संगठनों का हिस्सा रहे हरवीर सिंह निलौहा का कहना है कि आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि न तो कोई किसी की बात मानने को तैयार है और न ही किसी के पीछे लगने को। किसान संगठन तो बढ़ रहे हैं परंतु इन पर जातिवाद का ठपा लग रहा है। यह किसान राजनीति के पराभव का सबसे बड़ा कारण है। आज के किसान नेताओं में चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसा आकर्षण नहीं है। इसके लिए संगठन नेताओं की गुटबाजी भी जिम्मेदार है। किसान जाति और धर्म में बंट चुुका है।
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एकजुट होकर नहीं लगाया जाम
भारत बंद में भाकियू ने सबसे ज्यादा जगह जाम लगाया। हालांकि ऐसे संवेदनशील समय में भी भाकियू के दोनों गुट एक नहीं हुए। इन्होंने अलग-अलग जाम लगाकर सोशल मीडिया पर अपनी पीठ थपथपाई। वहीं, भाकियू तोमर, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन और भारतीय किसान आंदोलन ने भी अलग-अलग जाम लगाकर संगठनों की पहचान बनाने का प्रयास किया। यदि संगठन एकजुट होकर रणनीति के तहत काम करते तो बंद का नजारा कुछ और होता।
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फुस्स रहा रालोद और सपा का समर्थन
रालोद और सपा ने भी भारत बंद में किसानों का समर्थन करने का एलान किया था। हालांकि जाम के दौरान रालोद और सपा कार्यकर्ता कहीं भी नजर नहीं आए। सरकार की सख्ती से नेताओं ने भी एक जगह इकट्ठा होकर गिरफ्तारी देकर इतिश्री कर ली।
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