भाजपा की अंदरूनी सियासत के चलते उसे पंचायत चुनाव का पहला झटका नामांकन से पहले ही लग गया है। जिला पंचायत सदस्य के वार्ड-14 से घोषित प्रत्याशी नामांकन से पहले ही दौड़ से बाहर हो गई हैं। बाहर से लाकर मेरठ में वोट बनवाकर चुनाव मैदान में उतारने की एक गुट की तैयारी धरी रह गई।
सरूरपुर ब्लॉक में आने वाले जिला पंचायत के वार्ड-14 से भाजपा ने सुरभि चौधरी को प्रत्याशी घोषित किया। इस वार्ड से भाजपा के क्षेत्रीय मंत्री सतेंद्र भराला के भतीजे पंकज भराला की पत्नी ज्योति की भी दावेदारी थी। लेकिन, सतेंद्र भराला के विरोधियों ने पार्टी कोर कमेटी में अपना प्रभाव दिखाते हुए ज्योति की दावेदारी को किनारे कर सुरभि को प्रत्याशी घोषित करा दिया।
सुरभि को सिवालखास विधानसभा की सियासत के तहत प्रमोट किया गया है। जबकि, वास्तव में सुरभि मेरठ जिले की निवासी ही नहीं हैं। पेशे से फैशन डिजाइनर और एक कंपनी की मालिक 26 वर्षीय सुरभि को करीब दो माह पहले ही जिला पंचायत चुनाव के लिए प्रमोट किया गया। रोहटा ब्लॉक के गांव जटपुरा से उनका नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाया गया। मकान नं 244 में उनका वोट क्रमांक 1919 है। ग्राम जटपुरा के वार्ड-13 की मतदाता सूची में सुरभि का नाम दर्ज था। लेकिन, जब इस वोट पर आपत्ति हुई और जांच हुई तो पता चला कि वोट फर्जी तरीके से बना है। इस कारण वोट कट गया, लेकिन सुरभि को चुनाव लड़ाने के लिए मेरठ लाने वालों को इसका पता ही नहीं चला। रविवार को जब अनंतिम सूची जारी हुई तो उसकी अपमार्जन सूची में सुरभि का नाम दर्ज है।
नियमानुसार जिला पंचायत का चुनाव लड़ने वाले का नाम जनपद की किसी भी पंचायत सूची में दर्ज होना चाहिए। लेकिन, सुरभि का नाम मतदाता सूची से कट चुका है। सूत्रों के मुताबिक, सुरभि अमरोहा की रहने वाली हैं और वर्तमान में गाजियाबाद-दिल्ली में अपना व्यवसाय कर रही हैं। ऐसे में सिवालखास की राजनीति में भाजपा नेताओं ने निजी स्वार्थ के चलते पार्टी को शुरुआत में ही झटका लगा है।
कोर कमेटी ने क्यों नहीं की जांच
सुरभि को प्रत्याशी घोषित करने वाली कोर कमेटी के निर्णय पर भी अब सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि जिला स्तर से दावेदारी तय होने के बाद क्षेत्रीय कमेटी में भी इन नामों पर चर्चा हुई थी। ऐसे में कोर कमेटी ने क्याें नहीं प्रत्याशियों के पूरे बायोडाटा और उसके बारे में पता किया। मतलब साफ है कि टिकट तय करने में खुलकर गुटबंदी और प्रभाव का प्रयोग हुआ है। ऐसे में साफ है कि अन्य टिकट तय करने में भी गुटबाजी हावी रही होगी।