देवबंद की इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम में छात्रों को दीनी तालीम ही नहीं बल्कि पत्रकारिता भी सिखाई जाती है। पिछले करीब 100 वर्षों से छात्रों को पत्रकारिता में महारत हासिल कराई जा रही है। विभिन्न देशों से आए छात्र हस्तलिखित साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक समाचार पत्र तैयार करते हैं। जिन्हें बड़े सलीके से फ्रेम में कर संस्था के भीतर लगाया जाता है। प्रत्येक माह अलग अलग नामों और विभिन्न भाषाओं में करीब 110 समाचार पत्र निकाले जाते हैं। जिनमें मुद्दे भी अलग ही होते हैं।
इस्लामी तालीम के सबसे बड़े मरकज दारुल उलूम में दीनी तालीम ही नहीं बल्कि छात्रों को दुनियावी तालीम का ज्ञान भी दिया जाता है। जिसमें हिंदी, उर्दू, इंग्लिश, भौगोलिक, गणित, साइंस आदि विषय शामिल हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि संस्था में छात्रों को पत्रकारिता की तालीम भी दी जाती है और यह सिलसिला पिछले करीब 100 वर्षों से चला आ रहा है।
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इसमें खास बात यह है कि पत्रकारिता का ज्ञान हासिल करने वाले छात्र अलग अलग नामों और भाषाओं में हस्तलिखित साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक समाचार पत्र भी तैयार करते हैं। जिन्हें फ्रेम में कर संस्था के भीतर बड़े ही सलीके से लगाया जाता है। मौलाना अब्दुल रहमान कासमी के मुताबिक प्रत्येक माह बांग्ला, कन्नड़, आसामी, इंग्लिश, उर्दू, केरला, अरबी और मलयालम भाषा में करीब 110 से अधिक समाचार पत्र निकाले जाते हैं।
उन्होंने बताया कि संस्था में समाचार पत्र निकालने की शुरुआत करीब 100 वर्ष पूर्व हुई थी। सबसे पहले अल कासिम, अल रशीद और मासिक पत्रिका दारुल उलूम व साप्ताहिक अल ब्लाग निकलना आरंभ हुई थी। हर राज्य और जनपद के छात्र अपना समाचार पत्र अलग नाम और अपनी भाषा में निकालते हैं। जिन्हें आहता-ए-मोलसरी में और उसके आसपास फ्रेम में कर लगाया जाता है।
उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस पर छात्रों ने देश के इतिहास को लेकर समाचार पत्र निकाले जिन पर तिरंगा के अलावा दिल्ली का लालकिला और इंडिया गेट जैसी ऐतिहासिक इमारतों की तस्वीरें बड़े ही शानदार तरीके से बनाई गई हैं। साथ ही बताया कि पत्रकारिता को लेकर छात्रों के बीच प्रतियोगिता भी कराई जाती है। जिसमें उन्हें पुरस्कारों का वितरण भी किया जाता है।
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