खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) की तरफ से ड्रग विभाग द्वारा भरे जा रहे सैंपलों को लेकर विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है। विभागीय अधिकारी पूरे साल सैंपल भरने और निरीक्षण करने में लग रहे, लेकिन रिपोर्ट चुनिंदा सैंपलों की जारी की गई।
उधर, मुख्यालय स्पष्ट कर चुका है कि ड्रग के सिर्फ 20 फीसदी से भी कम सैंपल पेंडिंग हैं, जिन्हें जारी करने में तेजी लाई जा रही है। जिससे साफ है कि स्थानीय स्तर पर खेल हो रहा है और रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद कोर्ट में वाद दाखिल करने से लेकर पैरवी तक में लेटलतीफी की जा रही है।
ताकि उन लोगों को फायदा पहुंचा जा सका जिनसे सैंपल भरे गए थे। डेढ़ साल के दौरान ड्रग विभाग ने करीब 92 सैंपल भरे हैं, जिनमें रिपोर्ट करीब 15 की जारी की गई है। विभागीय अधिकारी बाकी रिपोर्ट पेंडिंग बता कर पल्ला झाड़ रहे हैं, जबकि विभाग से ही जुड़े एक उच्च अधिकारी ने बताया है कि लैब या मुख्यालय स्तर पर पेंडिंग पड़ी रिपोर्ट का प्रतिशत 20 से भी कम है।
उल्टे बीते एक साल के दौरान रिपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में तेजी आई है। पहले जहां ड्रग की रिपोर्ट देने मेें छह महीन का वक्त लग रहा था, अब दो से तीन महीने के अंदर रिपोर्ट जारी की जा रही है। वहीं, खाद्य विभाग से जुड़ी रिपोर्ट अधिकतम 45 दिनों के अंदर जारी कर दी जाती है।
खाद्य विभाग में धड़ल्ले से हो रहा काम
ड्रग विभाग में खेल खाद्य विभाग की कार्रवाई से समझा जा सकता है। बीते वित्त वर्ष खाद्य विभाग ने 397 सैंपल भरे जिनमें से सभी की रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है। इसमें से करीब 287 सैंपल फेल हो गए। जिसमें से 169 के खिलाफ वाद दाखिल किया गया। बाकी के खिलाफ नोटिस जारी कर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। इसी बीच 44 लोगों पर आर्थिक दंड लगाया गया, जिनसे 25.30 लाख रुपये जमा कराया गया। एक व्यक्ति को आर्थिक दंड व कारावास की भी सजा सुनाई गई है। जबकि ड्रग विभाग बीते दो साल में एक भी सजा नहीं कराया पाया है। जिन 15 सैंपलों की रिपोर्टों को सार्वजनिक किया गया है, उनमें से भी करीब पांच लोगों के खिलाफ ही कोर्ट में वाद दाखिल किया गया है।
ड्रग विभाग पर लगते रहे आरोप
बीते डेढ़ साल के दौरान ड्रग विभाग की टीम पर निरीक्षण के नाम पर वसूली करने से लेकर रिपोर्ट को मैनेज किये जाने तक के आरोप लगे हैं। कई दफा ड्रग व्यापारियों ने भी आरोप लगाया है कि ड्रग विभाग के दोनों इंस्पेक्टर हर साल निरीक्षण करते हैं, फिर भी निरीक्षण के नाम पर वसूली होती है। अगर कोई विरोध करता है तो उसी के यहां से सैंपल भर लिया जाता है। सैंपल भरने के बाद रिपोर्ट आने के बाद केस दाखिल करने तक में जानबूझ कर देरी की जाती है।