रोशनी और खुशियों के पर्व दिवाली पर बाजार की रौनक के बीच मिलावट का कारोबार भी पूरी तरह फलता फूलता है। दिवाली की शुरूआत में घर की रंगाई पुताई से लेकर दिवाली पूजन तक और त्योहार पर खाने वाली मिठाई तक में बड़े स्तर पर मिलावट हो रही है।
घर की रौनक बढ़ाने को नकली पेंट
बाजार में महंगे और ब्रांडेड पेंट के साथ नकली पेंट का कारोबार भी बड़े पैमाने पर होता है। इसमें महंगे पेंट की जगह किसी भी फर्जी नाम से सस्ते पेंट बाजार में उपलब्ध हैं। यही नहीं कुछ जगह तो छोटी कंपनियों के नाम पर भी नकली पेंट की पैकिंग बेची जा रही है। यह पेंट रंगों और केमिकल को मिलाकर तैयार होता है। जिसकी कीमत बाजार में ब्रांडेड पेंट से आधी होती है।
खाने की चीजों में सबसे ज्यादा मिलावट
दीवाली पर सबसे ज्यादा बिक्री घी और तेल की होती है। मुख्य रुप से सरसों का तेल पूजन के साथ ही खाद्य पदार्थ बनाने में भी प्रयोग होता है। लेकिन सरसों का शुद्ध तेल जहां बाजार में 100 रुपये लीटर उपलब्ध है, तो सस्ते के लालच में लोग नकली तेल भी खरीद रहे हैं। चावल की भूसी से निकलने वाले तेल में पीला रंग मिलाकर इसे सरसों का बना दिया जाता है। इसके अलावा पामोलीन ऑयल को भी केमिकल की मदद से पतला कर सरसों का तेल बताकर बेचा जा रहा है। वास्तव में इस तेल की कीमत बाजार में पचास रुपये लीटर तक होती है, लेकिन सरसों के नाम पर यही तेल 70 से 80 रुपये तक बेचा जा रहा है। वहीं शुद्ध देशी घी बाजार में लगभग 450 रुपये लीटर के हिसाब से बिकता है। लेकिन शहर में ऐसी भी दुकानें हैं जहां पर शुद्ध देशी घी 100 रुपये किलो बोर्ड लगाकर बेचा जा रहा है। देशी घी में मिलावट के लिए वनस्पति घी में रिफाइंड मिलाकर देशी घी की खुशबू का एसेंस प्रयोग किया जाता है। वहीं देशी घी में चर्बी तक का प्रयोग होने की बात दुकानदार करते हैं।
बेसन में सबसे ज्यादा मिलावट
दिवाली पर बेसन के लड्डू के साथ ही बूंदी के लड्डू और अन्य मिठाई आदि तैयार होती हैं। लोग घर में भी बेसन का प्रयोग करते हैं। लेकिन यह बेसन भी पूरी तरह मिलावट का शिकार है। बाजार में चने का शुद्ध बेसन 140 रुपये किलो से ज्यादा कीमत में उपलब्ध है। जबकि मिलावटी बेसन 60 से 80 रुपये किलो तक के रेट में उपलब्ध है। बेसन में मिलावट के दो तरीके हैं। सस्ता मिलावटी बेसन मैदे में पीला रंग मिलाकर तैयार कर दिया जाता है। जबकि उससे ऊपर की श्रेणी का मिलावटी बेसन मटर को पीसकर या चावल की किनकी को पीसकर तैयार होता है, जिसमें रंग मिलाया जाता है। यह बेसन 80 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध होता है।
मिठाई तो पूरी तरह नकली
मिठाई में सिंथेटिक मावे का खेल किसी से छिपा नहीं है। इस मावे से रसगुल्ले, बर्फी आदि तमाम मिठाई तैयार होती है। लेकिन अब महंगी काजू कतली में भी मिलावट का खेल होने लगा है। सात सौ रुपये किलो की कीमत में बिकने वाली काजू कतली में भी काजू की जगह मूंगफली की गिरी मिलायी जा रही है। मिठाई बनाने वालों के अनुसार कुछ लोग काजू की जगह मूंगफली की गिरी पीसकर उसमें काजू का एसेंस लगाते हैं और चीनी की चाशनी में इस मिश्रण को मिलाकर काजू कतली तैयार कर बेचते हैं। जिसकी लागत डेढ़ सौ रुपये के आसपास बैठती है।
बताशे और खिलौनों की शुद्धता से भी खेल
दीवाली पर आज भी परंपरा है कि खांड के बने खिलौने और बताशों के साथ खील से पूजा होती है। लेकिन यहां भी खेल शुरू हो चुका है। खांडसारी उद्योग लगभग बंद होने से खांड महंगी है। इसलिए चीनी से बताशे और खिलौने तैयार हो रहे हैं। इसमें अहम बात ये है कि बाजार की रिजेक्ट चीनी जो खराब हो जाती है वह और सरकारी सस्ते गल्ले की चीनी का प्रयोग सबसे ज्यादा बताशे और खिलौने बनाने में हो रहा है। लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार खांड के खिलौने बताशे अब उपलब्ध नहीं है।
ऐसे पकड़ सकते हैं मिलावट
जिला विज्ञान क्लब के समन्वयक दीपक शर्मा का कहना है कि कुछ मिलावटी खाद्य पदार्थों की मिलावट आसानी से पकड़ सकते हैं। बेसन को पानी में डालने पर मिलावटी बेसन का रंग ऊपर आ जाता है। ऐसे ही सरसों का तेल यदि मिलावटी है तो उससे आंख में चिरमिराहट सी लगती है। इसके अलावा इस तेल को हाथों पर पानी के साथ मिलाकर रगड़ने से रंग निकल आता है। जबकि देशी घी को सूंघने पर मिलावट का पता नहीं लग सकता। इसके लिए उसे हाथों से रगड़ें। यदि मिलावटी है तो निश्चित रुप से उसमें कहीं न कहीं दाना जरूर आयेगा। जबकि शुद्ध देशी में दाना नहीं होता है।