फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या आप जानते हैं सीताफल की खेती से जुड़ी खास बातें, ये तरीका अपनाने से होगा अधिक मुनाफा

Mon, 24 Feb 2020 01:16 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

इस सीजन में सीताफल की खेती करने से अधिक मुनाफा होगा। जानिए कैसे...
विज्ञापन
सीताफल की फसल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सब्जियों में कद्दू यानी सीताफल का प्रमुख स्थान है। इसके बड़े, गुद्देदार फल पके और कच्चे दोनों रूपों में सब्जी के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। सीताफल को सब्जी और कोफ्ता के अलावा टमाटर के साथ मिलाकर केचप भी बनाते हैं।

विज्ञापन


मेरठ में सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि विवि के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर एसके लोधी ने बताया कि इसमें विटामिन ए, बी और सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसे सामान्य तापक्रम पर कई महीनों तक भंडारित किया जा सकता है। ग्रीष्मकालीन फसल की बुआई फरवरी-मार्च और वर्षाकालीन फसल की बुआई जून-जुलाई में करते हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की बुआई के लिए 5-6 किग्रा बीज पर्याप्त है। अनुमानत: 100 ग्राम में लगभग 600 बीज होते हैं। ग्रीष्मऋतु के लिए कतार से कतार की दूरी दो से पांच मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 75 सेंटीमीटर होनी चाहिए। वर्षा ऋतु की फसल के लिए कतार से कतार की दूरी तीन मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 75 मीटर होनी चाहिए। इसकी औसत उपज प्रति हेक्टेयर 350-400 क्विंटल होती है।  

खाद एवं उर्वरक
खेत की तैयारी करते समय 20-25 टन कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद डालकर खेत में मिला दें। 80 किग्रा नाइट्रोजन, 80 किग्रा फास्फोरस और 50 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियां या थाले बनाते समय और नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो बराबर भागों में बांटकर खड़ी फसल में जड़ों के पास बुआई के 30 दिन और 45 दिन के बाद टॉपड्रेसिंग के रूप में देते हैं।

विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन

सिंचाई
वर्षाकालीन खेती में फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन मौसम जब सूखा रहता है तो आवश्यकतानुसार पानी लगाते हैं। ग्रीष्म काल में उगाई जा रही फसल में 4-7 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। तना बढ़ते समय, फूल आने से पहले और फल विकास की अवस्था पर पानी की कमी होने पर, उपज में भारी कमी हो जाती है। इन तीन अवस्थाओं पर पानी की कमी नहीं होने दें।

उन्नतशील किस्में
इसमें पूसा विकास, पूसा विश्वास, कल्याणपुर पम्पकिन 1, अर्का चंदन, अर्का, सूर्यमुखी, पूसा विकास, पूसा हाईब्रिड़-1, पूसा अलंकार, नरेंद्र अमृत एवं काशी हरित।

नोट- इन खबरों के बारे आपकी क्या राय हैं। हमें फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें


https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें