पिछले विधानसभा चुनाव में जिले में भाजपा और सपा का जोर रहा। इस बार दूसरे दल भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार हैं। दरअसल, हर विधानसभा चुनाव में जिले में अलग-अलग नतीजे आते हैं और मुद्दे भी बदलते रहे हैं। यह बात और है कि जातिगत समीकरण और वोटों का बंटवारा ही परिणाम तय करता है। पिछली बार जिन सीटों पर मुस्लिम बंटे, वहां भाजपा जीती। लेकिन जहां अन्य वोटर बंटे, वहां मुस्लिमों के सहारे सपा जीती। इस बार बसपा मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार है तो रालोद और कांग्रेस के भी बड़े दावे हैं। सपा में चल रहे घमासान पर भी सपाइयों के साथ दूसरे दलों की भी नजर है। भाजपा, रालोद और कांग्रेस को प्रत्याशी तय करने हैं। किसी गठबंधन की स्थिति में समीकरण पूरी तरह से अलग भी हो सकते हैं।
सिवालखास सीट
वैसे तो इस सीट को रालोद का गढ़ माना जाता है, लेकिन वर्ष-2007 में यहां बसपा और 2012 में सपा ने बाजी मारी थी। जाट-मुस्लिम बहुल इस सीट पर इस समय करीब 3.10 लाख मतदाता हैं। इनमें सबसे ज्यादा मुस्लिम करीब 95 हजार और उसके बाद जाट करीब 75 हजार हैं। संख्या के मामले में दलित मतदाता तीसरे नंबर पर हैं। यहां इनकी संख्या 40 हजार है, जबकि ब्राह्मण भी 35 हजार हैं। त्यागी, ब्राह्मण, राजपूत और गुर्जर वोट जहां निर्णायक भूमिका में हैं तो अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कश्यप, प्रजापति आदि के साथ वाल्मीकि समाज के वोट यहां यदि एक हो जाएं तो किसी की भी नैया पार लगा सकते हैं।
पिछला गणित : जाट बंटे और मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ
पिछले चुनाव में सपा के गुलाम मोहम्मद रालोद के यशवीर सिंह से करीब साढ़े तीन हजार वोटों से जीते थे। गुलाम मोहम्मद को अकेेले मुस्लिम होने का फायदा मिला था। रालोद, भाजपा और बसपा ने जाट प्रत्याशी उतारे थे। सपा को कुछ ओबीसी वोट भी मिले थे।
इस बार : बंटवारा रोकने की चुनौती
रालोद में इस सीट को लेकर सबसे ज्यादा घमासान है। रालोद के सारे दिग्गज यहीं से दावा जता रहे हैं। भाजपा में जाट और गैर जाट के बीच दावेदारी अटकी है तो बसपा ने इस बार मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर वर्तमान विधायक गुलाम मोहम्मद को मजबूत चुनौती दी है।
सरधना
यहां हर बार अलग-अलग दलों की जीत होती रही है। इस सीट पर करीब 3.25 लाख मतदाता हैं। इनमें मुस्लिम लगभग एक लाख हैं, जबकि ठाकुर 45 हजार, जाट 25 हजार, गुर्जर 40 हजार और दलित करीब 50 हजार हैं। ब्राह्मणों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग में सैनी बिरादरी भी यहां निर्णायक भूमिका में है।
पिछला गणित : दूसरे दलों में बंटे वोट, लाभ भाजपा को
वर्ष-2012 में भाजपा के संगीत सोम यहां से करीब 12 हजार वोटों से जीते थे। यहां सोम के पक्ष में ठाकुर बिरादरी के साथ अन्य वर्ग जहां एकजुट नजर आया तो मुस्लिम वोटों का बंटवारा सपा और रालोद के बीच रहा। वहीं, अतुल प्रधान के पक्ष में गुर्जर बिरादरी एकजुट नजर दिखी। बसपा प्रत्याशी को जहां दलित वोट एकमुश्त मिले तो जाट वोटों का बंटवारा बसपा और रालोद के साथ भाजपा के पक्ष में नजर आया।
इस बार : मुस्लिम मतों पर निगाह
इस सीट पर सपा में सबसे ज्यादा घमासान है। सपा ने पिछली बार चुनाव लड़े अतुल प्रधान का टिकट काट दिया था, लेकिन वह सीएम की सूची में हैं। दूसरी ओर, बसपा ने इस बार मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव लगाया है। रालोद के प्रत्याशी पर अभी निगाह है। संगीत भाजपा में हिंदुत्व का चेहरा हैं। ऐसे में दोनों ओर से होने वाले ध्रुवीकरण से चुनाव का नतीजा तय होगा।