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तीरगरान हिंसा में इकलौते चिराग बुझा, इंसाफ का इंतजार

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मेरठ। शहर का मिश्रित आबादी वाला मोहल्ला तीरगरान चार साल पहले सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसा था। तोड़फोड़, आगजनी और गोलीबारी में लाखों रुपये का नुकसान हुआ तो व्यापारी परिवार का इकलौता चिराग भी बुझ गया था। इस हिंसा की आड़ में कई नेताओं ने अपनी राजनीति चमकाई। लेकिन इसका सूत्रधार कौन था, पुलिस आज तक यह साबित नहीं कर पाई।
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प्याऊ लगाने पर हुआ था बवाल
10 मई 2014 को एक धार्मिक स्थल के बाहर सरकारी जमीन पर प्याऊ लगाने कोे लेकर कोतवाली थाना क्षेत्र के तीरगरान मोहल्ले में बवाल हुआ था। दो समुदाय के लोगों में मामूली कहासुनी के बाद बवाल हुआ। यह मामला इतना तूल पकड़ा कि यह छोटी सी चिंगारी ज्वाला बन गई थी। बलवा, तोड़फोड़, आगजनी और फायरिंग हुई। कई दुकानें टूटीं, आग लगाकर संपत्ति जलाकर राख कर दी गई। इस हिंसा में सराफा व्यापारी सुशील रस्तोगी के इकलौते बेटे शुभम की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
फिर नहीं हुई कोई गिरफ्तारी
तीरगरान हिंसा में थाना कोतवाली में 35 मुकदमे दर्ज हुए थे। जिसमें 13 अज्ञात मुकदमों में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट (एफआर) लगा दी थी। घटना के दौरान 15 लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था, जोकि जमानत पर छूट गए थे। बवाल में भाजपा नेता समेत 250 आरोपियों पर नामजद और 12 सौ अज्ञात लोगों पर केस दर्ज हुआ था। उसके बाद पुलिस ने किसी की गिरफ्तारी नहीं की। मामले की जांच क्राइम ब्रांच ने की। खानापूर्ति कर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। पुलिस अपनी लिखापढ़ी में साबित नहीं कर सकी कि यह सांप्रदायिक हिंसा किसने और क्यों करायी थी।
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शुभम के परिवार को इंसाफ का इंतजार
इस हिंसा में बेकसूर शुभम रस्तोगी मारा गया था। इस मुकदमे में बिलाल, मतलूब, सुल्तान व खालिद उर्फ अंडा नामजद आरोपी बने थे। इन चारों आरोपियों के खिलाफ अलग से जांच हुई थी। लेकिन चार साल बीतने के बाद भी पीड़ित परिवार को इंसाफ नहीं मिला। एक-एक करके सभी आरोपी जमानत पर छूटकर आ गए। बताया गया कि मेरठ पुलिस की जांच सिर्फ शुभम हत्याकांड पर टिकी है। इसके अलावा पुलिस दूसरे बिंदुओं पर जांच ही नही कर रही है। मुकदमा एडीजे-11 की कोर्ट में विचाराधीन है।
नहीं मिली नौकरी, परिवार में आक्रोश
शुभम की हत्या के बाद पुलिस-प्रशासन ने पीड़ित परिवार को आश्वासन दिया था कि शुभम की बहन प्राची को सरकारी नौकरी दिलाएंगे। आज तक पीड़ित परिवार को पुलिस-प्रशासन से न तो इंसाफ मिला और न ही नौकरी मिली। हालांकि पुलिस का दावा है कि शुभम के हत्यारोपियों के खिलाफ पुख्ता सुबूत जुटाए हैं। पुलिस-प्रशासन के इस रवैये को लेकर आज भी सुशील रस्तोगी और उनके परिवार में आक्रोश है।
दावों को भूली पुलिस
इस हिंसा में निर्दोष शुभम की मौत होने के बाद ही आरोपियों को नामजद किया गया था। गुदड़ी बाजार और सराफा बाजार के बीच स्थित तीरगरान मोहल्ला अतिसंवेदनशील इलाके में आता है। इस हिंसा की जांच के लिए शासन से आला अधिकारी भी पहुंचे थे। एफएसएल लखनऊ के अधिकारियों ने क्राइम सीन किया था। दावा किया गया था कि मामले की तह तक पहुंचा जाएगा। लेकिन समय बीतते-बीतते मामला ठंडा पड़ता गया और असली गुनहगार के गिरेबानों तक मेरठ पुलिस आज तक नहीं पहुंच सकी।
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खास बातें:
- मेरठ पुलिस नहीं पहुंच पाई असली आरोपियों के गिरेबान तक
- कई मुकदमों में लगी फाइनल रिपोर्ट, नामजद आरोपी भी गिरफ्तार नहीं
- हिंसा का शिकार हुए निर्दोष शुभम के परिवार को आज भी इंसाफ का इंतजार
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