मिर्जापुर। नागल क्षेत्र में पुल निर्माण के लिए गए महमूदपुर गांव के तीन मजदूरों की मौत की खबर ने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया। मृतकों के घरों में चीख-पुकार मच गई। गांव में हर किसी की आंखें नम थीं और पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाने के लिए लोगों की भीड़ उनके घरों पर जुटी रही।
ग्राम प्रधान हारून भी पीड़ित परिवारों के साथ जिला अस्पताल पहुंचे और हरसंभव मदद का भरोसा दिया। बताया जा रहा है कि गांव का ही एक ठेकेदार इन सभी मजदूरों को नागल में चल रहे निर्माण कार्य पर काम के लिए लेकर गया था। ग्रामीणों के अनुसार असगर तीन दिन पहले ही काम पर गया था, जबकि इस्तकार और शौकीन पांच दिन पहले गांव से नागल पहुंचे थे। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि काम की तलाश में गए ये युवक कभी वापस नहीं लौटेंगे।
25 मई को जानी थी बरात, मातम में बदली खुशियां
मृतक इस्तकार की मौत ने तो एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियां पलभर में उजाड़ दीं। उसके दो भाई और एक बहन हैं। पिता अशफाक और मां नसरीन ने रोते हुए बताया कि बेटे की शादी चिलकाना क्षेत्र के गांव दुमझेड़ा में तय हो चुकी थी और 25 मई को बरात जानी थी। घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं। कपड़े सिलने दे दिए गए थे। हलवाई, फोटोग्राफर, बरात ले जाने के लिए गाड़ियां आदि की बुकिंग हो गई थी, लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। बेटे की मौत की खबर सुनते ही मां-बाप पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। छोटी बहन मुस्कान भी भाई को याद कर बेसुध होकर रोती रही, जिसे महिलाएं किसी तरह संभाल रही थी। पिता अशफाक का कहना था कि जिस बेटे की बरात ले जाने का ख्वाब देखा था, अब उसका जनाजा उठता हुआ देख रहा है।
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परिवार में अकेला कमाने वाला था असगर
असगर अपने परिवार का इकलौता सहारा था, जो सरिया शटरिंग का काम करके घर का खर्च चलाता था। उसके परिवार में तीन बेटे और तीन बेटियां हैं, जिनमें से दो बेटियों की शादी हो चुकी है। एक बेटी और बेटा अविवाहित हैं। पति की मौत की खबर सुनते ही उसकी पत्नी बार-बार बेहोश हो रही थी, जिसे परिजन संभालने की कोशिश कर रहे थे। परिवार के सामने अब गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया है।
पिता की मौत के बाद शौकीन ही था परिवार का सहारा
मृतक शौकीन के पिता हारुन की दो साल पहले लंबी बीमारी के चलते मौत हो गई थी। उस वक्त सब जमा पूंजी पिता के इलाज पर खर्च हो गई थी। शौकीन की मजदूरी के बूते ही परिवार को दो वक्त की रोटी मिल रही थी। उसके तीन भाई और एक बहन हैं। सभी उससे छोटे हैं। सबसे छोटी बहन की उम्र केवल पांच साल है। इनकी पढ़ाई लिखाई का जिम्मा भी शौकीन के भरोसे ही था। उसकी मौत के बाद मां बॉबी और छोटी बहन उजमा बार-बार बेहोश हो रही थीं। आसपास व पड़ोस की महिलाएं उन्हें दिलासा दे रही थीं।
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एक दिन पहले ही गांव लौटे थे दो सगे भाई, हादसे की सोच कांप उठे
गांव के ही इरशाद और मुस्ताक सगे भाई हैं और नागल की साइट पर काम कर रहे थे, लेकिन दोनोंं बृहस्पतिवार रात ही घर वापस आए थे। गांव का ही सावेज चार दिन पहले मामा के इंतकाल के कारण घर लौट आया था। इस हादसे के बाद तीनों के परिजन यह सोचकर कांप उठे कि यदि यह भी वहीं टीन शेड में होते तो इनकी भी जान पर बन आती।
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खनिज से भरे ओवरलोड वाहनों पर नहीं लग रही रोक
नागल। हादसे के बाद ग्रामीणों में नियमों को ताक पर रखकर दौड़ खनिज वाहनों के खिलाफ गुस्सा दिखाई दिया। बोहडूपुर निवासी किसान नेता रविंद्र सैनी व अन्य ग्रामीणों ने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना था कि रात भर खनिज वाहन तेज रफ्तार दौड़ते हैं। इन वाहनों में से कई पर नंबर प्लेट तक नहीं लगी होती, जबकि अधिकांश ट्रक ओवरलोड होकर नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हैं।