सिद्धार्थ के चेहरे और शरीर पर चोट के निशान मिले थे। उन्होंने पोस्टमार्टम में अंकित करने के लिए डॉक्टरों से गुहार की थी, पर रिपोर्ट में चोटों का जिक्र नहीं किया गया। मौत का कारण भी अज्ञात दर्शाया गया। सिद्धार्थ के पिता डॉ सुरेंद्र सिंह ने चार अगस्त 2004 को मेडिकल थाने में मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य डॉ. ऊषा शर्मा, मेडिकल के छात्र सचिन मलिक, अमरदीप और यशपाल राणा के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कराया।
पुलिस ने जांच कर 2006 में अंतिम आख्या भेज दी थी। जिसके बाद सिद्धार्थ के पिता की तरफ से अदालत में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की गई। अदालत ने सुनवाई के बाद सचिन मलिक, अमरदीप और यशपाल राणा को तलब कर लिया था। प्राचार्य ऊषा शर्मा के विरुद्ध पुलिस की ओर से भेजी गई अंतिम आख्या स्वीकार कर ली थी।
तीनों आरोपियों के विरुद्ध विचारण अपर जिला जज कोर्ट संख्या एक गुरप्रीत सिंह बावा के न्यायालय में किया गया। सरकारी वकील नरेश दत्त शर्मा व वादी के अधिवक्ता योगेंद्र पाल सिंह चौहान व गौरव प्रताप ने वादी सहित कुल 20 गवाह पेश किए।
उनके बयानों व साक्ष्य के आधार पर डा. सचिन मलिक निवासी छपरौली बागपत, डा. अमरदीप सिंह निवासी गुरदासपुर व डा. यशपाल राणा निवासी मुजफ्फरनगर को आजीवन कारावास और एक-एक लाख रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है।
सरकारी वकील नरेश दत्त शर्मा ने बताया कि तत्कालीन प्राचार्य ऊषा शर्मा को भी हत्या के आरोप में तलब कर लिया है। जिनका विचारण अलग से किया जाएगा। वादी के अधिवक्ता योगेंद्र पाल सिंह ने बताया कि एमबीबीएस कर तीनों आरोपी डॉक्टर बन चुके हैं।