गांवों में पथ प्रकाश व्यवस्था के लिए सोलर लाइट लगवाने की योजना में ग्राम प्रधानों ने बड़ा घोटाला किया है। मेरठ की अगर बात करें तो नेडा द्वारा दी जाने वाली लाइट और ग्राम प्रधानों द्वारा स्वयं लगवाई जा रही लाइट की कीमत में भारी अंतर है। नेडा जहां 14000 रुपये की लाइट दे रहा है तो प्रधान उसी लाइट को 22 हजार रुपये तक की लगवा रहे हैं। सपा सरकार ने बिजली बचत और निर्बाध विद्युत आपूर्ति के लिए पथ प्रकाश व्यवस्था के लिए सोलर लाइट लगवाने की योजना लागू की थी। इस योजना के तहत प्रदेश के गांवों में ही नहीं बल्कि स्थानीय निकायों में भी सोलर लाइटें लगवाई गईं। यही नहीं विधायकों को भी सोलर लाइटें लगवाने के लिए दी गईं, जिसके लिए अलग से निधि दी गई थी।
शासन स्तर पर आई खेल की बू
नेडा को इस योजना की कार्यदायी संस्था नियुक्त किया गया था। इसके लिए सरकार से सोलर लाइट लगाने वाली कंपनियों के टेंडर मांगे गए और कुछ कंपनियां स्वीकृत कर दी गई। जिसके तहत नेडा को एक लाइट 21900 रुपये की दी जाती है। लेकिन इसके ऊपर सरकार 7100 रुपये का अनुदान देती है। जिसके तहत यह लाइट 14800 रुपये की लगाई जाती है। लेकिन इस अनुदानित लाइट की संख्या बहुत ही सीमित होती है। पिछले वित्तीय वर्ष में मेरठ को मात्र 187 अनुदानित लाइट दी गई थी। वहीं प्राइवेट कंपनियां इन लाइटों को लगाने की कुटेशन 12 हजार से 15 हजार रुपये की बीच डाल रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी महंगी लाइटों का टेंडर सरकार ने स्वीकृत कैसे किया। यदि इन सस्ती दरों की लाइटों का उन्हीं शर्तों पर टेंडर स्वीकृत कर लिया गया होता तो बगैर अनुदान के भी लाइट लग सकती थी। ऐसे में महंगी लाइटों का टेंडर स्वीकृत करना सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़ा का रहा है।
ग्राम प्रधानों ने उठाया फायदा
चूंकि नेडा से बिना अनुदान की लाइट 21900 रुपये में प्राप्त हो रही हैं, तो ऐसे में ग्राम प्रधान प्राइवेट कंपनियों से इन लाइटों को लगवाते हुए भुगतान जहां 12 से 15 हजार के रुपये के बीच कर रहे हैं, तो उसका बिल 22000 रुपये का डाला जा रहा है। जनपद में 482 ग्राम पंचायतों में करीब 450 में सोलर लाइटें लग चुकी हैं। इनमें कुछ गांव ऐसे हैं जहां पर 15-20 लाइट लगी हैं तो कुछ बड़े गांव ऐसे भी हैं जहां पर 70 से 100 लाइटें तक लगवाई जा चुकी हैं।
तकनीकी रूप से एक सी हैं ये लाइट
सूत्रों की मानें तो तकनीकी रूप से नेडा और प्राइवेट कंपनियों द्वारा लगाई जाने वाली लाइट एक जैसी ही हैं। ये प्राइवेट कंपनी भी उन्हीं शर्तों के तहत लाइट लगा रही हैं, जिस पर नेडा को आपूर्ति करने वाली कंपनियों की लाइट आ रही है। इससे इस संदेह को पूरा बल मिल रहा है कि सोलर लाइट योजना में बड़ा घोटाला शासन स्तर से ही शुरू हुआ है।
बड़ा है घपला
एक लाइट पर यदि देखें तो सीधे-सीधे सात से दस हजार रुपये का अंतर आ रहा है। ऐसे में यदि इन गांवों में औसतन 40-40 लाइट भी लगी हों और उनकी कीमत का अंतर 8 हजार रुपये बैठता है तो मोटे तौर पर 14 करोड़ से ज्यादा का घपला इन लाइटों में हो चुका है।