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डीएम के सवालों के आगे बेबस हुआ निगम, 15वें वित्त के 160 करोड़ के कार्य अटके

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मेरठ। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी सीएम ग्रिड योजना के टेंडर निरस्त करने पर मजबूर हुए निगम की कार्यशैली पर उठे सवाल अभी शांत भी नहीं हुए कि निगम की लचर कार्यशैली का एक और नमूना रविवार को सामने आया। 15वें वित्त आयोग के 160 करोड़ रुपये के विकास कार्यों पर भी अब ब्रेक लग गया है। यह इसलिए क्योंकि प्रस्तावित कार्यों के प्लान पर डीएम ने सवाल उठाए और उसका सही जवाब नहीं दिया जा सका तो तीन मई की बैठक की संस्तुतियां ही निरस्त कर दी गईं।
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इस धनराशि से कार्यों की संस्तुति महापौर हरिकांत अहलूवालिया की अध्यक्षता में तीन मई 2025 को विकास भवन सभागार में हुई बैठक में की गई थी। इसमें जिलाधिकारी, उपाध्यक्ष मेडा, नगर आयुक्त, अधीक्षण अभियंता, पीडब्ल्यूडी अन्य सदस्य थे। प्रस्तावित कार्यों पर चर्चा के बाद समिति की कार्यवाही का कार्यवृत्त तैयार कर निगम द्वारा जिलाधिकारी को हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया गया।
जिलाधिकारी ने सहमति न जताते हुए कई प्रस्ताव में वित्तीय अनियमितता का जिक्र करते हुए नगर आयुक्त को पत्र लिख दिया था। नगर निगम अब तक पत्र का जवाब नहीं दे पाया। इसके चलते निगम अफसरों को बैठक की समस्त कार्रवाई निरस्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
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इन मद में होना था कार्य
नगर निगम ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में 56.70 करोड़, वायु गुणवत्ता सुधार में 44.91 करोड़, जल संभरण में 29.61 करोड़ से संबंधित कई विकास कार्यों का 160 करोड़ रुपए का प्रस्ताव समिति के समक्ष रखा था। 15वें वित्त के कार्यों से शहर में सड़क नाला, पानी, सीवर, सफाई व कूड़ा निस्तारण से निजात मिलने की जल्द उम्मीद थी।

डीएम ने कार्यवृत्त पर नहीं किए हस्ताक्षर
प्रस्तावित कार्यों पर कई सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन समिति सदस्य जिलाधिकारी वीके सिंह ने कार्यवृत्त पर हस्ताक्षर नहीं किए, बल्कि कुछ सवाल उठाते हुए पत्र लिख दिया था। नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा भाजपा सांसद अरुण गोविल, राज्यसभा सदस्य डॉ लक्ष्मीकांत वाजपेई, राज्यमंत्री ऊर्जा डॉ सोमेंद्र तोमर, कैंट विधायक और पार्षदगणों द्वारा दिए गए प्रस्ताव का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया। मूल्यांकन में बरती गई लापरवाही, कार्यों के तकनीकी अनुमानों के सही न होने के कारण डीएम को संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
अधिक धनराशि के रखे गए थे प्रस्ताव
मुख्य आपत्ति यह भी रही कि वायु गुणवत्ता सुधार में शासन से मिली धनराशि से बहुत अधिक के प्रस्ताव रखे गए थे और इसके लिए ये तर्क दिया गया था कि भविष्य में इस मद में जो धनराशि प्राप्त होगी, उसका उपयोग किए जाने का अधिकार नगर आयुक्त को होगा। जिलाधिकारी द्वारा इसके लिए समिति को ही जिम्मेदार मानते हुए नगर आयुक्त को यह अधिकार दिए जाने से इन्कार कर दिया गया था। निगम प्रशासन की ऐसी लापरवाही के कारण शासन द्वारा जनता के लिए विकास कार्यों में और भी विलंब होगा।
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