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सीएम साहब ! देख लीजिए छह महीने में कितना हुआ विकास

Sat, 18 Nov 2017 12:18 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
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सीएम योगी आदित्यनाथ
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मेरठ। योगी जी आपके सूबे की क्रांतिकारी धरा मेरठ का क्या होगा। यहां न विकास हो रहा है और न पुरानी योजनाएं चल रही हैं। अफसरों का दावा है कि सरकार से धन नहीं मिल रहा है। शहर में नई सड़क बनना तो दूर पुरानी सड़कों का रखरखाव तक बंद है। पार्कों का सौंदर्यीकरण नहीं हो रहा है। कूड़ा निस्तारण, सीवर, गंगाजल योजना रुक गयी हैं। शहर में अगर कुछ चल रहा है तो अवैध कमेले हैं। अगर छह माह ऐसा ही हाल रहा तो शहर दस साल पीछे चला जाएगा। ये सभी सवाल महानगर की जनता के हैं। लोगों को सीएम योगी से काफी उम्मीदें हैं। मेरठ की जनता योगी जी को वैसा ही सीएम देखना चाहती है, जैसा सीएम की कुर्सी पर बैठते समय छह माह पहले देखने को मिला था। 
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पाइप लाइन में कब आएगा गंगाजल 
महानगर की जनता को गंगाजल उपलब्ध कराने के लिए सरकार भले ही 350 करोड़ रुपये खर्च चुकी है, लेकिन जनता को गंगाजल नहीं मिल रहा है। पूर्व सपा सरकार के कार्यकाल में गंगाजल योजना शुरू कर दी गयी थी। आधे शहर की जनता को गंगाजल पीने को मिल रहा था, लेकिन योगी सरकार आने के बाद गंगाजल पर भी ब्रेक लग गया। सरकार गंगाजल ट्रीटमेंट प्लांट संचालन के लिए धन तक नहीं उपलब्ध करा पा रही है। संचालन पर खर्च होने वाली धनराशि के लिए शासन स्वीकृति देने को तैयार नहीं है। 

अतिक्रमण करने वालों पर मेहरबान क्यों हो गयी सरकार 
महानगर की सड़कों पर अतिक्रमण का जाल है। सरकार बनते ही अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई थी। लेकिन 15 दिन के बाद शहर, सरकारी मशीनरी और नेता वही पुरानी व्यवस्था की तरफ लौटते नजर आए। अतिक्रमण के खिलाफ अभियान बंद होते चले गए। अब शहर का हाल है कि कोई सड़क ऐसी नहीं है जिस पर अतिक्रमण न हो। अतिक्रमण के कारण शहर हर समय जाम की चपेट में रहता है। 
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अवैध कमेलों पर क्यों हो गयी नरमी 
योगी  के लखनऊ में कुर्सी संभालते ही मेरठ में अवैध कमेलों पर कार्रवाई शुरू हो गयी थी। कुछ दिन बंद भी रहे थे। लेकिन उसके बाद शहर और देहात में अवैध कमेलों की बाढ़ आ गयी। जहां खुले में पशुओं को काटा जा रहा है वहीं सड़क किनारे रखकर मांस बेचा जाता है। न पुलिस कुछ करने को तैयार है और न ही अन्य प्रशासनिक अधिकारी। सरकारी भी चुप्पी साध गयी है।

पढ़ें : सीएम योगी आज मेरठ में, लखनऊ से आए स्पेशल कमांडो, रूट डायवर्जन
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लखनऊ में अटकी मेरठ की रिंग रोड 

टूटी हुई सड़कें - फोटो : अमर उजाला
महानगर जाम से जूझता है। परतापुर बाईपास से दिल्ली रोड शताब्दीनगर होते हुए हापुड़ रोड को जोड़ने वाली रिंग रोड के लिए तैयार प्रपोजल लखनऊ में अटका है। सरकार मोहर लगाने को तैयार नहीं है। पीडब्लूडी जैसा महत्वपूर्ण विभाग उप्र के डिप्टी सीएम के पास है। उसके बाद भी रिंग रोड हो या फिर रोहटा रोड का निर्माण सभी अटके हुए हैं। ।  

फाइलों में कैद कान्हा पशु आश्रय योजना 
सुप्रीम कोर्ट ने पशु क्रूरता को खत्म कराने के लिए अत्याधुनिक कांजी हाउस के निर्माण कराने के निर्देश दिए थे। कान्हा पशु आश्रय योजना शुरू करने के निर्देश दिए थे। कान्हा पशु आश्रय योजना का जो हाल है वह किसी से छुपा नहीं है। न कोई काम करने को तैयार है और न ही सरकार संज्ञान ले रही है। 

कूड़ा निस्तारण प्लांट की फाइल कब आएगी बाहर 
शहर के कूड़े का निस्तारण करने के लिए 2016 में सब्जबाग दिखाए गए थे। एक जनवरी 2017 को गांवड़ी में नगर निगम की भूमि पर प्लांट का भूमि पूजन किया गया। कमिश्नर, डीएम, नगरायुक्त, सांसद, महापौर, विधायक सभी भूमि भूमि पूजन में शामिल हुए। उसके बाद अधिकारी और जनप्रतिनिधियों ने कूड़ा निस्तारण प्लांट की तरफ मुड़कर नहीं देखा। अधिकारी ही नहीं बल्कि भाजपा के जनप्रतिनिधि भी केन्द्र सरकार की योजनाओं को संचालित कराने में गंभीर नहीं दिखे।  

 शौचालय बने नहीं, नालियों में बहता है मल 
स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहर में 36593 शौचालय बनाए जाने का लक्ष्य था। केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी योजना पर भी महानगर में पानी फिर गया। सरकारी मशीनरी सरकारी योजनाओं को लागू करने में कितनी गंभीर है इसकी बानगी स्वच्छ भारत मिशन की स्थिति से स्पष्ट होती है। महानगर में अभी तक केवल 998 शौचालय ही बनकर तैयार हुए हैं। बाकी 2100 शौचालयों पर कार्य संचालित बताया जा रहा है। इनमें भी काफी शौचालय ऐसे हैं जो गलत तरीके से रिकार्ड में अंकित कर दिए गए हैं।  

डोर टू डोर कूड़ा उठाने की व्यवस्था का जिन्न भी नहीं आया बाहर 
स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहर की स्वच्छता, घर में दो रंग के डस्टबिन और डोर टू डोर कूड़ा उठाए जाने के दिखाए गए सपने पल पल टूट रहे हैं। योजना पर सरकारी खजाना खर्च हो रहा है। लेकिन डस्टबिन और कूड़ा डठाने की प्रक्रिया अभी फाइलों में ही कैद है। पांच जून पर्यावरण दिवस पर इस सपने को साकार किया जाना था। लेकिन सपना दिन निकलते ही टूट गया। निगम अधिकारियों की यह घोषणा भी निगम की चार दिवारी में कैद होकर रह गयी।

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