मेरठ। बच्चों के बिना अधूरी जिंदगी गुजार रहे दंपतियों के लिए टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक वरदान साबित हो रही है। इस तकनीक के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है। हर साल 250 से 300 बच्चे मेरठ में संचालित 20 आईवीएफ केंद्रों के जरिए हो रहे हैं। लोगों को इस तकनीक के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 25 जुलाई को विश्व टेस्ट ट्यूब बेबी दिवस मनाया जाता है। इसे आईवीएफ डे या विश्व भ्रूण विज्ञानी दिवस भी कहते हैं।
बांझपन समाज में हमेशा से रहा है। पहले कम था, मगर अब भागदौड़ भरी जिंदगी, गलत और मिलावटी खानपान, नशा, तनाव और रेडिएशन आदि की वजह से यह काफी बढ़ गया है। पहले अमूमन महिला को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता था, मगर अब आधुनिक जांचों से पता चला है कि बच्चा न होने के महिला और पुरुषों का प्रतिशत लगभग बराबर है। सामान्य तौर पर माना जाता है कि अगर शादी के एक साल तक बच्चा नहीं होता तो चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।
यह है आईवीएफ
आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन। यह एक कृत्रिम गर्भाधान तकनीक है। इसमें महिला के अंडे और पुरुष के स्पर्म को लैबोरेट्री में एक साथ रखकर फर्टिलाइज करने के बाद महिला के गर्भ में ट्रांसफर कर देते हैं। इस प्रक्रिया को एंब्रियो कल्चर व टेस्ट ट्यूब बेबी भी कहते हैं। इसे करने में औसतन डेढ़ से ढाई लाख रुपये का खर्च आता है।
यह है इतिहास
इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में 25 जुलाई 1978 को दुनिया में पहली आईवीएफ शिशु लुई ब्राउन का जन्म हुआ। करीब ढाई किलोग्राम वजन की लुई ब्राउन आधी रात के बाद सरकारी अस्पताल में पैदा हुई। दुनिया का दूसरा टेस्ट ट्यूब बेबी लुई के 67 दिन बाद भारत में जन्मा था। अब लुई ब्राउन के भी बच्चे हो चुके हैं।
विदेश से भी मेरठ आ रहे लोग
आईवीएफ में भी नई-नई तकनीक आ गई हैं। मेरठ में उनके पास विदेश से भी इस तकनीक का लाभ लेने के लिए लोग आ रहे हैं। पुरुष को स्पर्म और महिला को अंड्डे संबंधी कोई भी परेशानी है, उन सबका हल है। - डॉ. सुनील जिंदल, इंफर्टिलिटी विशेषज्ञ
लोग हो रहे जागरूक
आईवीएफ विधि के प्रति लोगों में काफी जागरूकता आई है। 17 साल पहले महीने में चार-पांच मरीज आते थे, अब यह संख्या 40 से 50 पहुंच चुकी है। अगर कोई परेशानी है तो लोगों को इस तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। - डॉ. शशि सिंह, इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ
केस स्टडी-1
शास्त्रीनगर क्षेत्र के रहने वाले दंपती के 10 साल से कोई बच्चा नहीं था। उन्होंने आईवीएफ तकनीक का इस्तेमाल किया। अब उनके जुड़वा बच्चे हैं। दंपती का कहना है कि वे तो मायूस हो गए थे, मगर कुदरत ने तकनीक के जरिए सूनी गोद भर दी।
केस स्टडी-दो
गंगानगर क्षेत्र के रहने वाले दंपती के 24 साल बाद इसी तकनीक से बेटी का जन्म हुआ है। दंपती का कहना है कि सारी उम्मीदें खत्म हो गई थीं। फिर आईवीएफ का सहारा लिया। पहली बार में ही औलाद की खुशी से दामन भर गया।