चौरी चौरा की तरह 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर प्रदर्शन किया गया था। पुलिस ने भीड़ को थाने में घुसने से रोकने के लिए फायरिंग कर दी थी। गोली लगने से गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह और अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह शहीद हो गए थे। इसके अलावा कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
पुलिस की गोली से दो लोगों की मौत के बाद भीड़ उग्र हो गई थी, लेकिन थाने पर हमला नहीं किया गया। थाने पर हमला न होने से चौरी चौरा जैसी घटना होने से बच गई थी। इस घटना के बाद पुलिस ने काफी लोगों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की थी। करीब 32 लोग गिरफ्तार किए गए।
छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना लगाया गया था। गिरफ्तार लोगों को लोअर कोर्ट से छह-छह वर्ष की सजा मिली। अपील के बाद सेशन कोर्ट से 16 व्यक्ति छूट गए शेष को दो-दो वर्ष की सजा हुई। फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की गई। इसके बाद अप्रैल 1944 में सभी की रिहाई हुई।
इनके विरुद्ध हुई थी रिपोर्ट दर्ज
नूरपुर थाने के रिकॉर्ड के मुताबिक इस मामले में नूरपुर निवासी राजकुमार, कृपाशंकर, उमराव सिंह, कल्लन, नौबहार सिंह, नियादर, बुद्धु, चंदन सिंह, होरी, बहाव, रामस्वरूप, पतराम सिंह, जसराम सिंह, मल्लु, नारायण, किशोरी, चंद्रपाल, गणेशी, बलदेव सिंह, प्रताप सिंह के अलावा चांदपुर निवासी क्षेत्रपाल सिंह, कल्लू चौहान, मूला सिंह व लल्लू उर्फ कल्लू के नाम प्रकाश में आए थे, जिन्हें मुकदमे में शामिल किया गया था।