लोकसभा की छपरौली, बड़ौत, बागपत, सिवालखास और मोदीनगर विधानसभा सीट का अपना-अपना जातीय गणित है। पिछले चुनाव के नतीजे बताते हैं कि छपरौली में रालोद हमेशा अजेय रही, जबकि मोदीनगर हमेशा पहेली ही रही है।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी डॉ. सत्यपाल सिंह को मोदीनगर सीट पर एक लाख 27 हजार 239 वोट मिले थे, जबकि जयंत सिंह को 90505 वोट ही मिल पाए थे। भाजपा को मोदीनगर से मिली लीड ही निर्णायक साबित हुई थी। छपरौली में तब रालोद प्रत्याशी को सिर्फ 13 हजार 142 मतों की बढ़त मिली थी।
लेकिन इस बार समीकरण और गठबंधन बदल गए हैं। साल 2019 में आमने-सामने चुनाव लड़े भाजपा-रालोद इस बार एनडीए में शामिल है। बागपत सीट रालोद के हिस्से में आई और यहां से शुक्रवार को जनता डॉ. राजकुमार सांगवान के भाग्य का फैसला करेगी।
सीएम योगी आदित्यनाथ, राजकुमार सांगवान व जयंत चौधरी
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रालोद के लिए महत्वपूर्ण है छपरौली
रालोद के लिए छपरौली सीट महत्वपूर्ण है। यहां से जब-जब बड़ी बढ़त मिली है, तब-तब रालोद ने लोकसभा चुनाव में जीत की तरफ कदम बढ़ाया है। यहां का मतदान प्रतिशत महत्वपूर्ण साबित होगा। देखने वाली बात यह होगी कि गेहूं कटाई की व्यस्तता के बीच छपरौली के मतदाताओं का रुख क्या रहता है।
इस सीट पर टिका 27 के चुनाव का गणित
बागपत लोकसभा सीट के नतीजों पर ही वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का गणित भी टिका है। भाजपा-रालोद गठबंधन के भविष्य का फैसला बागपत का चुनाव ही तय करेगा।
भाजपा में इनकी प्रतिष्ठा का भी सवाल
चुनाव में भाजपा की ओर से वर्तमान सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह, राज्यमंत्री केपी सिंह और बागपत विधायक योगेश धामा की प्रतिष्ठा का भी सवाल है। पिछले दस साल में यह तीनों जनप्रतिनिधि भाजपा का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। रालोद के गढ़ में दो-दो चुनाव जीत चुके हैं।
यह मतदाता साबित होंगे निर्णायक
बागपत लोकसभा सीट पर जाट-मुस्लिम मतों के अलावा अति पिछड़ा वर्ग, पिछड़ा वर्ग, ब्राहमण और अन्य स्वर्ण वर्ग के मतदाता भी निर्णायक होंगे।
त्रिकोणीय मुकाबले में फंसा चुनाव, दांव पर जयंत की प्रतिष्ठा
बागपत। लोकसभा सीट पर चुनाव पूरी तरह से त्रिकोणीय मोड पर आ गया है। जयंत की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। जहां रालोद, सपा, बसपा तीनों ही प्रत्याशी जातीय समीकरण साधने को एक-दूसरे के कोर वोटर में सेंधमारी में जुटे रहे। पिछड़े वोटर पर चुनाव टिक गया है।
रालोद-भाजपा गठबंधन होने के साथ ही जाट प्रत्याशी डा. राजकुमार सांगवान के कारण जाटों में बिखराव नहीं होता दिख रहा है। वहीं इस गठबंधन से रालोद से मुस्लिम वोटर का नुकसान होता नजर आ रहा है, जबकि मुस्लिमों का रुख सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ दिख रहा है तो सपा का कोर वोटर कहे जाने वाले यादव में रालोद-भाजपा गठबंधन सेंधमारी कर सकता है।
हालांकि गठबंधन के प्रत्याशी अमरपाल शर्मा ब्राह्मण बिरादरी से होने के कारण उनमें मजबूत पकड़ मानी जा रही है। वहीं बसपा से गुर्जर प्रत्याशी प्रवीण बंसल भी रालोद-सपा का जातीय समीकरण बिगाड़ सकते हैं। बसपा को मिलने वाले वोट पर भी चुनाव टिका है और दलित व अन्य पिछड़ा वोट में कितना उनको मिलता है, यह भी हार-जीत की स्थिति को तय करेगा।
मतदान प्रतिशत बढ़ाने को घरों से वोटर लाएंगे कार्यकर्ता
पहले चरण में बागपत से सटी कैराना, मुजफ्फरनगर समेत अन्य सीटों पर मतदान प्रतिशत काफी कम रहा है। उससे बागपत के प्रत्याशियों की चिंता बढ़ी हुई है। इसलिए ही रालोद व भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को घरों से वोटरों को बूथ तक लेकर जाने की जिम्मेदारी सौंपी है। क्योंकि यह माना जा रहा है कि अगर वोट प्रतिशत कम रहता है तो उसका नुकसान सीधे तौर पर रालोद-भाजपा गठबंधन को उठाना पड़ सकता है।