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चारागाह की 30 करोड़ की जमीन बिल्डरों के नाम

Wed, 23 Nov 2016 01:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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सरकारी जमीन पर प्रशासनिक स्तर पर ही ऐसा खेल हुआ कि करोड़ों रुपये की चारागाह की जमीन दो बिल्डरों के नाम कर दी गयी। साठगांठ का यह खेल तहसील से शुरू होकर अपर आयुक्त तक पहुंचा और फिर तहसील पर आकर समाप्त हो गया। अधिकारी एक-दूसरे के आदेश को खारिज करते रहे और आखिर में इस लड़ाई को हाईकोर्ट तक पहुंचाने के बजाए सेटिंग का खेल तहसील सरधना में ही निपटा दिया गया। जिसके बाद करीब तीस करोड़ रुपये से ज्यादा की 20 हजार वर्ग मीटर जमीन बिल्डरों के नाम कर दी गयी।
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ये है पूरा मामला
एनएच-58 पर ग्राम सिवाया के पास एक बिल्डर द्वारा वर्ष 2013 में कॉलोनी का निर्माण शुरू किया गया। इस दौरान बिल्डर ने सरधना के तत्कालीन एसडीएम को आवेदन पत्र दिया कि उसकी कॉलोनी के बीच में सरकारी पशुचर की जमीन आ रही है। ऐसे में इस जमीन को बिल्डर के नाम कर दिया जाए और बदले में दूसरी जगह जमीन उपलब्ध करा दी जाएगी।

नियमों का उल्लंघन कर सेटिंग
इस आवेदन के बाद तत्कालीन एसडीएम ने जमीन 25 मार्च 2013 को बिल्डर के नाम दर्ज कर दी। जबकि नियमानुसार यह मामला शासन के पास प्रस्ताव बनकर जाना था और वहां से दिशा-निर्देश मिलने के बाद जमीन ट्रांसफर होनी थी। इस मामले में जब तत्कालीन जिलाधिकारी नवदीप रिणवा से शिकायत हुई तो उन्होंने तत्काल प्रभाव से एसडीएम अखंड प्रताप सिंह को हटा दिया और अरविंद मिश्रा की तैनाती कर दी। अरविंद मिश्रा ने 11 फरवरी 2014 को पूर्व एसडीएम के आदेश निरस्त करते हुए जमीन वापस कराने के आदेश दिए।
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अपर आयुक्त के यहां आदेश खारिज
इस मामले में बिल्डरों ने कमिश्नर के यहां अपील दायर की। जिस पर अपर आयुक्त ने अपील स्वीकार करते हुए 27 अगस्त 2014 को एसडीएम अरविंद मिश्रा के आदेश निरस्त करते हुए पूर्व एसडीएम का आदेश बहाल कर दिया।

न शासन को रिपोर्ट, न अपील
नियमानुसार अपर आयुक्त के आदेश आने पर एसडीएम सरधना को इस मामले पर पूरी रिपोर्ट बनाकर जिलाधिकारी को सौंपनी थी। डीएम के माध्यम से यह मामला शासन में जाता। या फिर अपर आयुक्त के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय या राजस्व परिषद में अपील करनी थी। जहां से सुनवाई के बाद इस पर कोई फैसला होता। क्योंकि पशुचर या सरकारी जमीन के मामले में तहसील या जिला स्तर से फैसले लेने का अधिकार नहीं है। लेकिन तहसील सरधना के अधिकारी साठगांठ के तहत मौके के इंतजार में आदेश दबाकर बैठ गए। जब जिलाधिकारी पंकज यादव का ट्रांसफर हुआ और नये डीएम के रूप में जगत राज त्रिपाठी ने कार्यभार संभाला, तभी चुपके से जमीन 11 अगस्त 2016 को बिल्डरों के नाम कर दी गयी।

कांशी में भी हो रहा कब्जा
पशुचर की जमीन पर कब्जे का यह अकेला मामला नहीं है। परतापुर कांशी गांव में भी पशुचर की करीब डेढ़ लाख वर्गमीटर जमीन है। जिसमें करीब 50 हजार वर्ग मीटर पर इस समय कब्जा हो चुका है। दो साल पहले पार्षद की शिकायत पर कब्जा हटाने का अभियान भी चला था। लेकिन साठगांठ के खेल में शिकायत दब गयी। इसके बाद फिर से जमीन पर कब्जा होना शुरू हो चुका है।

कानूनी लड़ाई लड़ेंगे
मामला बहुत गंभीर है। इस पूरे मामले की फाइल तलब कर शासन को रिपोर्ट भेजने के साथ ही कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। वहीं, जो भी इस मामले में संलिप्त है, उनके खिलाफ भी कार्रवाई तय होगी। कांशी की जमीन पर तारबंदी कराकर उसे भी कब्जा होने से बचाया जाएगा।- बी. चंद्रकला, जिलाधिकारी
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