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अब सेंट्रल मार्केट पर लटकी ध्वस्तीकरण की तलवार

Wed, 02 Aug 2017 09:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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आवास एवं विकास परिषद की शास्त्रीनगर योजना में भूउपयोग परिवर्तन कर बनाये गये सेंट्रल मार्केट पर एक बार ध्वस्तीकरण की तलवार लटक गयी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो दुकानों पर दिये गये स्टे के बाद ठंडे बस्ते में चले गये इस मामले में आरटीआई एक्टिविस्ट राहुल राणा की याचिका पर हाईकोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर गंभीर रुख अपनाया है। इस मामले में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दो दुकानों पर स्टे होने के बाद बाकी दुकानों पर कार्रवाई न करने पर जवाब मांगा है।
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आवास एवं विकास परिषद ने आरटीआई में मांगी गयी सूचना के तहत 2013 को सेंट्रल मार्केट को अवैध करार दिया था। जिसमें परिषद ने बताया था कि उनके रिकार्ड में सेंट्रल मार्केट नाम का कोई बाजार नहीं है। सेक्टर छह और सेक्टर तीन के बीच बने इस मार्केट में परिषद द्वारा 2563 आवासीय भूखंड आवंटित किये गये थे। जिसमें 9770 भवन बने हैं। लेकिन 571 लोगों ने इन आवासीय भूखंडों का भूउपयोग परिवर्तन कर बड़ी दुकानें और शोरूम बना लिये। 
इस मामले पर जब आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना ने 2013 में परिषद से जवाब मांगा तो परिषद ने स्पष्ट कर दिया कि भूउपयोग परिवर्तन पूरी तरह अवैध है और पूरा सेंट्रल मार्केट अवैध तरीके से बसाया गया है। परिषद ने यह भी कहा कि उनकी तरफ से कुल 777 भवन मालिकों को भूउपयोग परिवर्तन के लिए नोटिस भी जारी किया गया है। 
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अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था समाचार 
अमर उजाला मायसिटी में 5 जून 2013 को सेंट्रल मार्केट अवैध शीर्षक से प्रमुखता के साथ समाचार प्रकाशित किया गया था। जिसके बाद आवास एवं विकास परिषद हरकत में आया तो व्यापारियों में हड़कंप मच गया था। इस मामले में हाईकोर्ट में रिट दायर की गयी और वहां से कार्रवाई के निर्देश मिलने पर आवास विकास परिषद ने कार्रवाई शुरू की। इस पर प्लाट संख्या 661-6 में बनी दो दुकानों के मालिक किशोर वाधवा और विनोद कुमार सुप्रीम कोर्ट चले गये और वहां से स्टे ले आये। इसके साथ ही जब आवास एवं विकास परिषद ने पुलिस प्रशासन के साथ कार्रवाई को अंजाम देना चाहा तो व्यापारियों के दबाव में कार्रवाई नहीं हुई और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। 

आठ सप्ताह में कार्रवाई के साथ जवाब मांगा 
इस मामले में पिछले दिनों आरटीआई एक्टिविस्ट राहुल राणा ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए चीफ सेक्रेटरी, आयुक्त - आवास एवं विकास परिषद्, मेरठ के कमिश्नर, डीएम, संयुक्त आवास आयुक्त मेरठ सहित पांच अफसरों को पार्टी बनाया। जिस पर 27 जुलाई को दो न्यायधीशों की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए नाराजगी जतायी। खंडपीठ ने कहा कि जब दो दुकानों पर ही सुप्रीम कोर्ट का स्टे था तो बाकी दुकानों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गयी। इस मामले में खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर इस आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारियों को देने और आदेश प्राप्ति के आठ सप्ताह के भीतर इस मामले में कार्रवाई करते हुए जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। 
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