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शिक्षा के साथ प्रकृति को भी संजो रहा सीसीएसयू

Sun, 30 Jun 2019 03:18 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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सीसीएसयू
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सीसीएसयू कैंपस शिक्षा के साथ प्रकृति को भी संजो रहा है। 54 साल पहले दो कमरों से शुरू हुआ विवि दूसरे संस्थानों के लिए एक सीख है। यहां पर पानी बचाने को 40 रेन वाटर हार्वेसिंग सिस्टम लगाए गए हैं। 70 फीसदी बिजली की खपत सोलर ऊर्र्जा प्लांट से हो रही है। कूड़ा निस्तारण प्लांट के निर्माण का काम भी शुरू हो चुका है।
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एक जुलाई सन 1965 को मेरठ यूनिवर्सिटी की शुरुआत नौचंदी में राजस्थान के भूतपूर्व गर्वनर रघुकुल तिलक के घर प्रभात प्रेस से हुई थी। यहां पर टेंट लगाकर काम होता था। कैलाश प्रकाश जब उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री बने तो उन्होंने डिग्गी के पास पड़ी जमीन को विवि के लिए आवंटित कराया। करीब साल भर तक टेंट आदि लगाकर ही काम किया गया। कक्षाएं भी टेंट में ही चलीं। पहले कुलपति प्रो. आरके सिंह ने कैंपस में बहुत काम कराया। साल 1992 में मेरठ यूनिवर्र्सिटी का नाम बदलकर चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी रखा गया। साल 2000 में कुलपति प्रो. रमेश चंद्रा के कार्यकाल में खूब काम हुआ। साल 2003 तक यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा बिल्डिंग बनी। सर छोटूराम कॉलेज शुरू हुआ। यूनिवर्सिटी में खाली पड़ी जमीन पर पेड़ और पार्क बनवाए गए। आल विवि से संबद्घ मेरठ-सहारनपुर मंडल के कॉलेजों की संख्या 11 सौ को पार कर चुकी है।

सबसे ज्यादा हरियाली से घिरा है विवि
222 एकड़ में फैले विवि का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा हरियाली से घिरा है। कैंपस में 13 हजार से ज्यादा पेड़ हैं। सैकड़ों प्रजातियों के इन पेड़ों में नीम, कंघी, साइकस, एनोस्टोनिया, यूकेलिप्टिस, अमनतास, बरगद, पीपल, पिलखन, नीम, बेल पत्थर, आंवला, आम और अमरूद आदि शामिल हैं। हरियाली की वजह से यहां पर दुर्लभ पक्षियों की प्रजातियां है। हजारों लोगों के घूमने के लिए कैंपस के भीतर पेड़ों घिरा तपोवन में खूबसूरत ट्रैक है।
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40 रेन वाटर हार्वेसिंग सिस्टम से रिचार्ज हो रही धरती
कैंपस में चार ट्यूबवेल हैं। वैसे तो पानी का लेवल 120 फीट तक आ जाता है, लेकिन स्वच्छ पानी के लिए इन ट्यूबवेल के बोर 250 फीट तक कराए गए हैं। पहले विवि में पानी का लेवल हर साल मई-जून महीने में 250 फीट से गिरकर 260 से 265 फीट तक पहुंच जाता था। जिसके चलते पाइप रिबोर करने पड़ते थे। नौ साल पहले विवि में रेन वाटर हार्वेसिंग सिस्टम की शुरुआत हुई। इनकी संख्या अब 40 हो चुकी है। जितनी भी बिल्डिंग हैं सभी का पानी बरसात में रेन वाटर हार्वेसिंग सिस्टम के जरिए जमीन में पहुंचाया जाता है। पिछले बार इसका परिणाम ये हुआ कि जून महीने में भी पानी का लेबल 250 फीट से कम नहीं हुआ है। इसके कारण पाइप रिबोर करने की जरूरत नहीं पड़ी।

सौ ऊर्जा प्लांट से बच रहे एक करोड़
विवि में बिजली के दो कनेक्शन हैं। पूरे साल करीब 48 लाख बिजली यूनिट की खपत होती है। विवि करीब पौने चार करोड़ रुपये का बिल भरता था। कुलपति प्रो. एनके तनेजा की पहल पर यहां सौर ऊर्जा प्लांट की शुरुआत हुई। इसके बाद से विवि को प्रति यूनिट महज 3.90 रुपये में बिजली मिल रही है। विश्वविद्यालय की क्षमता 1260 किलोवाट है। प्रथम फेज में 860 किलोवाट का सौर ऊर्जा प्लांट काम कर रहा है। इससे विवि सालाना एक करोड़ रुपये बचा रहा है।

कूड़ा निस्तारण प्लांट के निर्माण का काम शुरू
कैंपस का जितना भी कूड़ा है उसका अब यहीं पर निस्तारण होगा। इसके लिए विवि में कूड़ा निस्तारण प्लांट के निर्माण का काम शुरू हो गया है। इसे अंबिकापुर स्वच्छ मॉडल की तर्ज पर बनाया जा रहा है। यह पर्यावरण को बचाने में सीसीएसयू का बड़ा सहयोग होगा।

बड़े स्तर पर पौधरोपण किया
विवि में हरियाली बढ़ाने को इस बार बड़े स्तर पर पौधरोपण कराया जा रहा है। प्रकृति को बचाने के लिए विवि इसी तरह आगे भी प्रयासरत रहेगा। - प्रो. एनके तनेजा, कुलपति सीसीएसयू
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