गंगा की सहायक नदी के रूप में पहचान रखने वाली काली नदी का वजूद पर सिर्फ औद्योगिक कचरे ही नहीं, बल्कि इंसानी स्वार्थ की भी काली छाया पड़ी है। मुजफ्फरनगर के अंतबाड़ा गांव से निकलकर कन्नौज तक एक बड़ी आबादी की प्यास बुझाने वाली यह नदी आज बदबू, बीमारियों और प्रदूषण फैलाने वाली नदी के रूप में पहचानी जाती है।
बढ़ते कब्जे के कारण इसका दायरा सिमट रहा है। नदी का यूं सिमटना बड़ी आबादी के लिए खतरे की घंटी है। वजह यह कि अथाह जल राशि को अपने भीतर समाहित कर लेने वाली नदी के क्षेत्रफल में आई सिकुड़न अब अधिक बारिश को झेलने में असमर्थ है। अधिक बारिश होने की स्थिति में नदी के किनारे बसे 1200 गांव और कस्बे बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। यह चिंता इसलिये भी है, क्योंकि इस बार मौसम विभाग ने मानसून के दौरान सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना जता रखी है।
नदी के किनारे बढ़ते कब्जे से बाढ़ और पानी भरने की समस्या आबादी में दस्तक दे चुकी है। समौली, खेड़ी, पनवाड़ी और देदवा सहित कई गांव मेरठ में काली नदी के किनारे बसे हैं, जहां कब्जा है। स्थानीय नागरिक बताते हैं कि बरसात होते ही, नदी का पानी किनारे पर बने मकानों तक आ जाता है। इस बार मानसून की अच्छी संभावना होने के कारण काली नदी में भी पानी बढ़ सकता है। बारिश के मौसम मेें सबसे बड़ी परेशानी काली नदी पर हो रहे कब्जे की होगी। कई गांवों में तो किनारों पर किसान खेती भी कर रहे हैं, जिसके चलते नदी पर कब्जा बढ़ता ही जा रहा है।
150 फीट से अधिक थी बेसिन की चौड़ाई
पर्यावरण विद रमन त्यागी ने बताया कि क ागजों में देखें तो एक जमाने में काली नदी के बेसिन की चौड़ाई 150 फीट से भी अधिक थी। लेकिन, बेसिन पर होते कब्जों ने नदी को खत्म करने में मुख्य भूमिका निभाई है। किसानों ने खेत बढ़ाकर कब्जे कर लिए, सड़क निर्माण हो गया। परीक्षितगढ़ की तरफ नदी के किनारे सॉलिड वेस्ट प्लांट संचालित कर नदी के बेसिन पर कब्जा कर लिया गया है। नदी अब एक तिहाई ही बची है। कब्जे और प्रदूषण के कारण नदी की इकोलॉजी एकदम खत्म हो गई है।
वर्जन
काली से प्रदूषण के साथ-साथ कब्जा भी बढ़ता जा रहा है। पहले नदी पर कब्जा नहीं था, लेकिन वर्तमान में बढ़ रहा है। इस कारण से काली नदी के हालात भी बदल रहे है। -पुरुषोत्तम, सचिव काली नदी संघर्ष समिति
काली नदी में पहले पानी भी साफ आता था और कब्जा भी नहीं था। अब कब्जे की समस्या भी बढ़ती जा रही है। इस कारण अगर पानी बढे़गा तो उसकी निकासी में परेशानी होगी। -अजयवीर सिंह, महामंत्री काली नदी संघर्ष समिति