मेरठ की शहर विधानसभा सीट से बसपा उम्मीदवार कुंवर दिलशाद ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है। उन्होंने पार्टी आलाकमान से कहा कि वह चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। दिलशाद रविवार को सहारनपुर में हुई बसपा सुप्रीमो की रैली में भी नहीं गए। हालांकि उन्होंने इसका कारण स्वास्थ्य खराब होना बताया है। लेकिन माना जा रहा है कि रैलियों के नाम पर लगातार बढ़ते खर्चों के दबाव और शहर में बसपा का वर्तमान में माकूल समीकरण न बन पाने के चलते उन्होंने मैदान से हटने में ही भलाई समझी।
मेरठ जिले की सातों सीटों पर बहुजन समाज पार्टी ने अपने प्रत्याशियों की काफी पहले ही घोषणा कर दी थी। हालांकि बाद में कई विधानसभा पर टिकटों की अदला-बदली हुई। कई उम्मीदवारों का टिकट तो काटा ही गया, साथ ही पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखाया गया। कैंट सीट पर शैलेंद्र चौधरी का टिकट काटकर पूर्व विधायक सतेंद्र सोलंकी को दिया गया। सरधना से भी संजीव धामा का टिकट काटकर हाजी याकूब कुरैशी के बेटे इमरान कुरैशी को वहां से चुनावी मैदान में उतार दिया गया।
इन दोनों ही मामलों में पिछले उम्मीदवारों को पार्टी से बाहर भी किया गया। अनिश्चिताओं के खेल में अब शहर से बसपा प्रत्याशी कुंवर दिलशाद ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। उन्होंने पहले स्वास्थ्य खराब होने के चलते हाथ खड़े करने की बात कही, पर चर्चा कुछ ओर ही है।
समीकरण और खर्चों के बोझ से हांफे
दूसरी तरफ चर्चा यह है कि शहर सीट पर बसपा का समीकरण सटीक नहीं बैठ रहा है। यहां बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला मैच नहीं कर रहा हैै। कुंवर दिलशाद मुस्लिम राजपूत हैं और यहां इस बिरादरी के वोटरों की संख्या अंसारी, कुरैशियों और सैफियों से काफी कम है। इसके अलावा यहां दलित वोटर भी इतने ज्यादा नहीं हैं कि इस आंकड़े पर चुनावी नैया को पार लगा सकें। सपा उम्मीदवार रफीक अंसारी को यहां अंसारियाें का काफी वोट मिलता है।
बसपा का असली खेल ही यहां सपा बिगाड़ रही है। हालांकि सपा आलाकमान का आंकलन यह है कि बसपा इस सीट पर सपा का खेल बिगाड़ देती है। उधर समीकरण सटीक न हों और खर्चों का बोझ बढ़ता जाए तो यह भी स्थिति खराब कर रहा है। पार्टी में कई लोगाें का कहना है कि कभी रैली के नाम पर तो कभी सम्मेलन के नाम पर बसपा में खर्चाें का बोझ बढ़ गया है। रविवार को सहारनपुर में मायावती की रैली के लिए भी हर विधानसभा से सौ बसें ले जाने का लक्ष्य रखा गया था, जिससे दिलशाद ने हाथ खड़े कर दिए थे। वह रैली में भी नहीं गए।
ब्राह्मण या वैश्य की तलाश
पार्टी अब यहां विकल्प पर विचार कर रही है। इस सीट पर ब्राह्मणों और वैश्यों की संख्या ज्यादा है, जिनके दम पर यहां भाजपा की कश्ती पार लगती रही है। बसपा इसी पर सेंधमारी के चक्कर में है। यदि दोनों में से किसी एक जाति का उम्मीदवार उतार दिया जाए और साथ में दलित वोटर रहें तो बात बन सकती है। हालांकि यहां सैफी भी टिकट मांग रहे हैं।
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वर्तमान में शहर सीट का हाल
सीट पुरुष महिलाएं अन्य कुल
शहर 168122 139764 22 307908
जातिवार अनुमानित आंकड़े
ब्राह्मण (65 हजार), वैश्य (40 हजार), जाट (9 हजार), त्यागी (11 हजार), प्रजापति (10 हजार), पाल (9 हजार), लोधी (पांच हजार), अंसारी (48 हजार), कुरैशी (35 हजार), सैफी (25 हजार), मुस्लिम राजपूत (8 हजार), अन्य (42 हजार)
( नोट : ये आंकड़े बसपा थिंक टैंक द्वारा तैयार किए गए हैं )
कोट
अब आखिरी में जो भी आदेश होंगे देखा जाएगा, पर फिलहाल तो इंकार ही है। स्वास्थ्य पहले खराब था। फिर ठीक हो गया। ऐसा ही चल रहा है। आज की रैली में तो मैं बस गया ही नहीं।- कुंवर दिलशाद, बसपा उम्मीदवार
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शहर प्रत्याशी कुंवर दिलशाद स्वास्थ्य कारणों से चुनाव लड़ने से इंकार कर रहे हैं। अभी इस पर पार्टी सुप्रीमो को निर्णय लेना है।- अतर सिंह राव, वेस्ट यूपी प्रभारी बसपा