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बासमती में गर्दनतोड़ बीमारी का निकला तोड़, निर्यात में नया मोड़

Thu, 25 Apr 2019 03:49 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

4 लाख टन तक भारतीय बासमती का होता है सालाना यूरोपियन देशों में निर्यात
बीईडीएफ के वैज्ञानिकों ने पूसा बासमती 1637 का नया बीज विकसित किया
इस प्रजाति में नहीं लगेगी गर्दनतोड़ बीमारी, न ही होगा किसी केमिकल का प्रयोग
ट्राईसाइक्लाजोल पेस्टीसाइड के कारण यूरोपियन देशों ने लगा दी थी बासमती पर रोक
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बीईडीएफ सेंटर पर बासमती की नई प्रजाति की जानकारी देते डाॅ. रितेश शर्मा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 बासमती के किसानों और निर्यातकों के लिए यह अच्छी खबर है। बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान (बीईडीएफ) मोदीपुरम के वैज्ञानिकों ने पूसा बासमती 1637 को नया बीज विकसित किया है। इसकी खासियत यही है कि इन प्रजाति की फसल में न तो गर्दनतोड़ बीमारी होगी और न ही ट्राईसाइक्लाजोल पेस्टीसाइड का प्रयोग होगा। दो साल पहले इसी पेस्टीसाइड की वजह से यूरोपियन देशों ने भारतीय बासमती की खरीद पर रोक लगा दी थी। इस नई प्रजाति की फसल से बासमती के निर्यात में नया मोड़ आएगा।
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बीईडीएफ के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डा रितेश शर्मा के अनुसार भारत दुनिया भर में बासमती उत्पादन मेें नंबर वन है। बासमती की खुशबू और गुणवत्ता के कारण अन्य देश इसे हाथोंहाथ लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों से बासमती चावल में पेस्टीसाइड के प्रयोग को लेकर आ रही समस्या के चलते निर्यात में परेशानी आ रही थी। ऐसे में वैज्ञानिकों ने बासमती की फसल में लगने वाली गर्दनतोड़ बीमारी का तोड़ निकाल ही लिया। अब नयी प्रजाति पूसा बासमती 1637 में गर्दन तोड़ बीमारी नहीं लगेगी। अब बीमारी नहीं होगी तो फिर केमिकल का स्प्रे भी नहीं किया जाएगा। किसानों को बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान में बीज तैयार कर दिया जा रहा है।
भारत बासमती का सबसे बड़ा निर्यातक
वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया के 70 प्रतिशत बासमती चावल की उपज भरत में ही होती है। भारत के बाद पाकिस्तान का नंबर आता है। भारत ही यूरोपियन संघ और शेष विश्व में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। हर साल यहां से निर्यात बढ़ता जा रहा है।
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क्या है ये रोग
वैज्ञानिकों के अनुसार ये रोग पिरीकुलेरिया ओराइजी नामक कवक से फैलता है। अत्यंत हानिकारक होता है। पत्तियों और उनके निचले भागों पर छोटे और नीले धब्बे बनते हैं, जो बढ़कर नाव की तरह हो जाते हैं। इस रोग का लक्षण पहले पत्तियों पर दिखाई देता है। यह फफूंदजनित है और पौधे के पत्तियों, गांठों व बालियों के आधार को भी प्रभावित करता है। धब्बों के बीच का भाग राख के रंग का और किनारे कत्थई रंग के घेरे की तरह होते हैं।
विदेशों से हो गया था मना
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रितेश शर्मा के अनुसार भारतीय बासमती का सालाना करीब 3.6 लाख टन से 4 लाख टन का निर्यात होता है। खासकर यूरोपियन देशों में निर्यात होता है। इस प्रजाति में ट्राईसाइक्लाजोल की जरूरत नहीं पड़ेगी। यूरोपियन देशों में इस पेस्टीसाइड पर प्रतिबंध है। इस पेस्टीसाइड के कारण ही विदेशों ने चावल लेने से मना कर दिया था। अब इस नयी प्रजाति से किसानों को काफी लाभ मिलेगा।

प्रजाति में ये है खास
- इस प्रजाति में गर्दन तोड़ बीमारी नहीं लगेगी
- 135 से 140 दिन में तैयार होगी यह प्रजाति
- 60 से 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होगा
- पानी की मात्रा सामान्य ही चाहिए
- जब बीमारी नहीं तो केमिकल का प्रयोग नहीं
- प्रजाति का दाना अच्छा होगा, खाने में भी स्वादिष्ट

निर्यात की समस्या से निजात
बासमती 1637 प्रजाति किसानों के लिए अच्छी है, इसका बीज फार्म पर तैयार कर किसानों को दिया जा रहा है। नयी प्रजाति में गर्दन तोड़ बीमारी नहीं लगेगी। यह भी अच्छा है कि स्प्रे की भी जरूरत नहीं है। यूरोपियन देशों में भी निर्यात की समस्या से काफी हद तक निजात मिलेगी। -डॉ. रितेश शर्मा, प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक, बीईडीएफ

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