मुंडाली/माछरा। क्षेत्र में आलू मुख्य फसल होने के कारण कीट, रोग और खरपतवारों के कारण इसमें काफी नुकसान हो सकता है। इसमें झुलसा रोग लगने का खतरा, कोहरा, पाला और कम रोशनी के कारण बढ़ रहा है। ऐसे में किसान सावधानियां बरतें।
एडीओ कृषि राजकुमार ने किसानों को बताया कि देशभर में करीब ढाई लाख हेक्टेयर से भी अधिक भूमि में आलू की खेती की जाती है। कोहरा, पाला इस फसल के लिए हानिकारक होता है। बताया कि आलू की अगेती फसल में झुलसा रोग दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में लगना शुरू हो जाता है। पछेती फसल में झुलसा रोग जनवरी माह के प्रथम सप्ताह से लगना शुरू हो जाता है। झुलसा रोग पछेती आलू की फसल के लिए अधिक नुकसानदायक होता है। यह रोग फाईटीपथोरा नामक फफूंदी से होता है, जोकि पांच दिन में आलू के पौधे को नष्ट कर देती है। यह रोग आलू की हरी पत्तियों को पूर्णत: नष्ट कर देता है। कंदों पर इसका हमला हाेता है। पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैं, जो बाद में भूरे और काले हो जाते हैं। पत्तियों के नष्ट होने पर आलू का आकार छोटा हो जाता है। यह बीमारी कम रोशनी, कोहरा, पाला और बारिश में अधिक होता है।
सावधानिया : आलू की फसल को झुलसा रोग से बचाने के लिए किसान को साइमोइक सेनिल, मैनकोजेब, तीन किलोग्राम को एक हजार लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। फेनोमेडान, मैनकोजेब तीन किलोग्राम एक हजार लीटर पानी में मिलाकर भी छिड़काव किया जा सकता है। डाईमेथामार्क एक किलोग्राम के साथ दो डिब्बे मैनकोजेब मिलाकर एक हजार लीटर पानी में मिलाकर और प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।