भाजपा के सांगठनिक पुनर्गठन में नए क्षेत्रीय अध्यक्ष की ताजपोशी को लेकर सस्पेंस बना है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक बैठकों के बावजूद हर दिन बनते-बिगड़ते समीकरणों और पार्टी दिग्गजों के हस्तक्षेप से नेतृत्व फिलहाल अनिर्णय की स्थिति में है।
पश्चिम में क्यों फंसा है पेंच
पश्चिमी यूपी को हमेशा से सूबे की राजनीति का पावर सेंटर माना जाता रहा है। इस बार क्षेत्रीय अध्यक्ष पद के लिए खींचतान की मुख्य वजह जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधना है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर इस समय गुर्जर-जाट बनाम गैर गुर्जर चेहरे को लेकर सबसे बड़ा पेच फंसा हुआ है।
गुर्जर-जाट बनाम गैर गुर्जर की जंग
एक खेमे का तर्क है कि राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ गठबंधन को देखते हुए जाट बाहुल्य वाले इस क्षेत्र में किसी मजबूत जाट चेहरे को कमान सौंपी जाए, ताकि तालमेल बेहतर रहे। जबकि सपा की ओर से गुर्जर समाज को बढ़ावा देने से सजग भाजपा क्षेत्रीय अध्यक्ष पद किसी गुर्जर नेता को ही देना चाह रही है।
इससे फिलहाल मामला गुर्जर-जाट बनाम गैर गुर्जर का बन गया है। दूसरे खेमे का तर्क है कि अभी तक सरकार और भाजपा में जिलाध्यक्ष में प्रतिनिधित्व नहीं मिलने वाली कैडर जातियों में से किसीको क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया जाए।
क्षेत्रीय अध्यक्ष पद के दावेदार
भाजपा पश्चिम क्षेत्र में नवाब सिंह नागर, अशोक कटारिया, नरेश गुर्जर एडवोकेट, मनोज पोसवाल, एमएलसी मोहित बेनीवाल, अजित चौधरी, हरीश चौधरी, देवेंद्र सिंह, बसंत त्यागी, नरेश त्यागी एडवोकेट, इंद्रपाल बजरंगी, अंकुर राणा, आशीष प्रताप सिंह, डीके शर्मा, विकास अग्रवाल, मुकेश सिंघल, प्रमोद चंडालिया आदि अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं।
दिग्गजों के वीटो से उलझी आलाकमान की राह
पश्चिम क्षेत्र के कई बड़े नेता, जिनमें केंद्रीय मंत्री, सूबे के मंत्री और सांसद शामिल हैं, अपने-अपने करीबियों को इस कुर्सी पर बैठाने के लिए जोर लगा रहे हैं। बंद कमरों में हो रही समन्वय बैठकों में जब भी किसी एक नाम पर सहमति बनती दिखती है तभी विरोधी खेमे के किसी दिग्गज की आपत्ति आ जाती है।
हाईकमान किसी भी सूरत में ऐसा फैसला नहीं लेना चाहता, जिससे संगठन में गुटबाजी पैदा हो जाए। भाजपा नेताओं का कहना है कि पश्चिम क्षेत्र की कमान जिसके हाथ में होगी, उसीके कंधों पर 2027 के विधानसभा चुनावों का पूरा दारोमदार होगा। यही वजह है कि मुरादाबाद, मेरठ और सहारनपुर मंडलों के कद्दावर नेता अपनी पसंद का अध्यक्ष चाहते हैं। इसी खींचतान में घोषणा बार-बार टल रही है।