महापौर चुनाव में भाजपा की हार की लगातार समीक्षा की जा रही है। भाजपाई अपनी खामियां छिपाने के लिए लगातार बयानबाजी और रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। हालांकि इससे बूथ रिपोर्ट मेल नहीं खा रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार दलित-मुस्लिम गठबंधन से एकतरफा हुए मतदान की वजह से भाजपा की हार हुई है। हालांकि बूथ रिपोर्ट कुछ और ही बयां कर रही है। जिससे साफ नजर आ रहा है कि नगर निगम चुनाव में महापौर पद पर भाजपा के पक्ष में करीब 40 फीसदी दलित वोट गया। ऐसे में साफ है कि भाजपा अपने परंपरागत सामान्य और अन्य पिछड़ा वोटों को नहीं संभाल पाई।
ये है आंकड़ों की स्थिति
महापौर पद पर कुल 5,38,427 वोट पड़े। जिसमें बसपा को 2,34,814, भाजपा को 2,05,235, सपा को 47,153, कांग्रेस को 28,794 और रालोद को 9,175 वोट प्राप्त हुए, जबकि अन्य वोट निर्दलियों के खाते में गए। बसपा और भाजपा के वोटों को मोहल्लों और कॉलोनियाें के बाद मतदान केंद्र और उससे भी आगे जाकर बूथवार देखा जाए तो पूरा गणित समझा जा सकता है। नगर निगम चुनाव में सबसे ज्यादा मतदान दलित वर्ग ने किया। उनके बूथों का मतदान प्रतिशत इसकी गवाही दे रहा है। हालांकि मुस्लिमों के मतदान केंद्रों पर अपेक्षा से बहुत कम मतदान हुआ है। मुस्लिम बहुल बूथों को जोड़ कर कुल मतदान पर नजर डाली जाए तो यह करीब 47-48 फीसदी रहा। दलित बूथों पर मतदान और प्रत्याशियों को प्राप्त वोटों को देखें तो करीब 1,16,000 दलित वोट नगर निगम चुनाव में पड़ा। जिसमें करीब 45 हजार वोट भाजपा को मिले। ऐसे में दलित वोटों को एकतरफा बसपा के पक्ष में कहे जाने की बात निराधार नजर आ रही है।
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