सिवालखास विधानसभा सीट भाजपा में इस बार हॉट सीट में शामिल है। यह बात अलग है कि आज तक एक बार भी भाजपा को यहां से जीत हासिल नहीं हुई है। लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली जबरदस्त सफलता के बाद इस सीट पर दावेदारों की लंबी लाइन लग गई है।
सिवालखास विधानसभा सीट 2007 तक आरक्षित सीट रही। इस सीट पर 1974 से 1985 तक कांग्रेस का कब्जा रहा। लेकिन 1989 के चुनाव में यह सीट जनता दल के कब्जे में आ गयी। इसके बाद जनता दल से टूट कर चौधरी चरण सिंह द्वारा बनायी गयी भारतीय किसान कामगार पार्टी ने 1996 में इस सीट पर कब्जा किया। लेकिन तत्कालीन विधायक बनारसी दास चांदना की मृत्यु हो जाने पर हुए उपचुनाव में बसपा के सुंदरलाल वर्मा विधायक चुने गये। 2002 के चुनाव में एक बार फिर यह सीट भाकिकापा के बदले नाम रालोद के कब्जे में चली गयी और रनवीर राणा विधायक चुने गये। 2007 के चुनाव में बसपा की लहर आयी तो बसपा के विनोद हरित यहां से विधायक चुने गये। 2012 में यह सीट अनारक्षित हो गयी, तो सपा की लहर में यहां से गुलाम मौहम्मद विधायक चुने गये।
करीब 3.50 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर जाट और मुस्लिम मतदाता सबसे ज्यादा और लगभग बराबर हैं। इसके बाद दलित मतदाताओं का नंबर आता है। हालांकि ब्राह्मण, त्यागी, गुर्जर और ठाकुर भी यहां निर्णायक स्थिति में हैं। साथ ही अन्य जातियां यहां किसी का भी गणित बिगाड़ने में समर्थ हैं। बागपत संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाली सिवालखास विधानसभा से लोकसभा 2014 के चुनाव में भाजपा से निर्वाचित सांसद डा. सत्यपाल सिंह को अच्छी बढ़त मिली थी। इसी से उत्साहित भाजपाई इस बार इस सीट पर पूरे जोश से दावेदारी कर रहे हैं।
इस सीट पर जिला पंचायत सदस्य डा. मीनाक्षी भराला, भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य पं. सुनील भराला, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मनिंदरपाल सिंह, पूर्व प्रदेश कार्य समिति सदस्य अतुल सिंह, अनिता सिंह, जितेंद्र पाल सिंह उर्फ बिल्लू, संजय चौधरी, डा. केपी सिंह और अंकुर राणा मुख्य रूप से दावेदारी जा रहे हैं। इन लोगों के आवेदन पार्टी नेतृत्व के पास पहुंच चुके हैं।
पहली बार इतने नाम
पार्टी के पुराने लोगों का कहना है कि इससे पहले दो या तीन दावेदारों से ज्यादा इस सीट पर सामने नहीं आये। बात अगर वोटों की करें, तो 2012 के चुनाव में पहली बार भाजपा यहां से 18 हजार वोट हासिल कर चौथे नंबर पर रही थी। जबकि तीसरे नंबर पर रहने वाली बसपा को भी 42 हजार वोट मिले थे।