मेरठ। नगर निगम चुनाव सहित भाजपा को पूरे जिले में करारी हार का सामना करना पड़ा। नगर निकाय चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उतरी भाजपा को उसके ही सिपाहियों ने ऐसा ठगा कि पूरे जनपद में मात्र एक नगर पंचायत पर बमुश्किल जीत हासिल कर पायी। इस करारी हार के पीछे भाजपा की आपसी गुटबाजी, भितरघात और चुनावी प्रबंधन पूरी तरह से फेल होना रहा।
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निगम चुनाव से पहले ही भाजपा में गुटबाजी और घोर अनुशासनहीनता साफ नजर आ रही थी। बड़े नेता ही एक दूसरे की टांग खींचने से कभी पीछे नहीं रहे। मुख्यमंत्री का कार्यक्रम रहा हो या प्रदेश सरकार के मंत्रियों का मेरठ आगमन रहा हो, भाजपा के जनप्रतिनिधि और नेता आपस में उलझे हुए नजर आए। यह खींचतान लगातार चलती रही। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। इस बीच नगर निगम चुनाव घोषित हुए तो हर कोई अपनी मनमर्जी पर उतर आया। तमाम टिकट जनप्रतिनिधियों ने अपनी मर्जी से दिलाए। जो नहीं दिला सके, उन्होंने कुछ बागियों को मैदान में उतार दिया। जनप्रतिनिधियों और संगठन के नेताओं ने जिन चहेतों को पार्षद प्रत्याशी बनवाया, अपनी ताकत उन्हीं को जिताने में झोंक दी और महापौर का चुनाव प्रबंधन सिर्फ कागजों में सीमित होकर रह गया।
मतदान में खुल गयी थी कलई
अमर उजाला ने 23 नवंबर के माई सिटी में ‘वोटर लिस्ट से लेकर बूथ तक भाजपाई फेल’ खबर प्रकाशित की थी। जिसमें स्पष्ट लिखा था कि चुनाव को लेकर भाजपा ने कोई होमवर्क नहीं किया। न ही वोटर लिस्ट पर ध्यान दिया और न ही बूथ का मैनेजमेंट ही बना पाई। जिसका खामियाजा भाजपा के पक्ष में कम मतदान के रूप में भुगतना पड़ा।
106 की बंपर टीम ने भरी हवाई उड़ान
भाजपा ने चुनाव संचालन में 106 लोगों की बंपर टीम उतारी। जिसमें वर्तमान प्रदेश महामंत्री और महानगर चुनाव प्रभारी विजय बहादुर पाठक, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, सांसद राजेंद्र अग्रवाल, विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल, विधायक डॉ. सोमेंद्र तोमर सहित महानगर और जिले के तमाम दिग्गज शामिल थे। इस दौरान तीन दिवसीय महा जनसंपर्क अभियान भी चलाया गया। लेकिन मतदान के दिन और मतगणना में साफ हो गया कि यह चुनाव संचालन समिति सिर्फ हवा में काम करती रही।
सेटिंग के खेल ने बिगाड़ा गणित
हार के बाद जाते भाजपाई
- फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला ने 25 नवंबर के माई सिटी में ‘प्रत्याशियों को चौंका रहा वोट की खातिर बना गठजोड़’ शीर्षक से प्रमुखता से समाचार प्रकाशित किया था। जिसमें जिला और महानगर के कुछ नेताओं पर बसपा प्रत्याशी से साठगांठ कर भाजपा पार्षद प्रत्याशी को जिताने की शर्त पर बसपा के महापौर प्रत्याशी को वोट दिलाने की साठगांठ की थी। बूथवार मतदान के आंकड़ों ने यह सिद्ध कर दिया कि भाजपाई गढ़ में बसपा प्रत्याशी को अपेक्षा से कहीं ज्यादा वोट मिले। वार्ड 10 के परतापुर स्थित बूथ पर जाट समुदाय के वोट थे, यहां पर रालोद प्रत्याशी ने बसपा प्रत्याशी को हराया। लेकिन महापौर पद पर यहां बसपा प्रत्याशी को अच्छे वोट मिले। ऐसी ही स्थिति गंगानगर, पल्लवपुरम, कंकरखेड़ा, शास्त्रीनगर और जागृति विहार क्षेत्र में भी नजर आयी।
चार सांसद और छह विधायक दिला पाए सिर्फ एक सीट
भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही शर्मनाक रहा। जिले में भाजपा के चार सांसद सक्रिय हैं। जिसमें मेरठ-हापुड़ सीट पर राजेंद्र अग्रवाल, बिजनौर-हस्तिनापुर सीट पर कुंवर भारतेंद्र सिंह, मुजफ्फरनगर-सरधना से डॉ. संजीव बालियान और बागपत-सिवालखास से डॉ. सत्यपाल सिंह सांसद हैं। जबकि जिले में सरधना, सिवालखास, हस्तिनापुर, किठौर, मेरठ दक्षिण और कैंट सीट पर भाजपा के विधायक हैं।
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केंद्र और प्रदेश सरकार के ये जनप्रतिनिधि भी मिलकर जिले में एक नगर निगम, दो नगर पालिका और 13 नगर पंचायतों में से सिर्फ एक नगर पंचायत परीक्षितगढ़ पर बमुश्किल जीत हासिल कर पाए। बाकी सभी जगह करारी हार हाथ लगी। जबकि निगम को छोड़ दें तो बाकी जगह जनप्रतिनिधि अपनी मर्जी से प्रत्याशी तय कराकर लेकर आए थे।
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