संजय भाटी की मांग पर कैश काउंटिंग की मशीन जीआईपीएल के कार्यालय नोएडा पर उपलब्ध कराई गई थी। और बैंक से बिना हस्ताक्षर हुए विभिन्न पार्टियों को बैंक से नगद भुगतान किया।
संजय भाटी की कंपनी जीआईपीएल बिजेंद्र सिंह हुड्डा की कंपनियों के जुड़ने के बाद बैंक में ज्यादा काम आने लगा। जीआईपीएल कंपनी में निवेशकों का जो 70 करोड़ नगद आया था। उसको विजय कुमार शर्मा ने संजय भाटी से मिलीभगत कर अपनी कंस्ट्रक्शन कंपनी वाइट हाउस ग्रेटर नोएडा में लगा लिया था। और करीब साढे सात करोड़ रुपए जीआईपीएल व आईटीवी के खातों से इसी कंस्ट्रक्शन कंपनी में गया।
संजय भाटी ने अपने दो डायरेक्टर श्यान आरिफ, विवेक सिंह को नियम विरुद्ध विजय कुमार शर्मा की सहमति से बैंक में जीआईपीएल कंपनी में निवेशकों के धन राशि को समायोजन करने के लिए बैठाया।
जबकि इन दोनों की बैंक में न तो नियुक्ति थी। और न ही अधिकारी थे। विजय कुमार शर्मा ने मनमाफिक रूप से बिजेंद्र सिंह हुड्डा की कंपनी पीटीपीएल, आईटीवी व गर्वित इन्फोटेक के नाम पर गाड़ियों के लिए 2 करोड़ 10 लाख का लोन मनमानी तरीके से अपने बैंक से दिलाया।
जीआईपीएल के निवेशकों को पैसा मिलना बंद हो गया। तभी लोग दुखी होकर झगड़ा करने लगे। लेकिन संजय भाटी, बिजेंद्र सिंह हुड्डा के कहने पर वीके शर्मा ने गैरकानूनी तरीके से आपराधिक षड्यंत्र के तहत लाखों चेक नोबेल बैंक की छपवाये और उसमें से 2.61लाख चैक निवेशकों को दे दिए गए।
यह बात विजय कुमार शर्मा को अच्छी तरीके से पता थी कि निवेशकों को जो चैक दिए जा रहे हैं वह फर्जी हैं और उनका कोई मूल्य नहीं है। लेकिन विजय कुमार शर्मा ने कार्य किया। और इस प्रकार जीआईपीएल के डायरेक्टर व नोबेल बैंक के चेयरमैन वीके शर्मा आपस में मिलीभगत करके लाखों निवेशकों को फर्जी चैक देने में सफल हुए।
निवेशकों ने इन सभी चैकों को बैंक खातों में जमा कराया गया तो खातों में पैसा न होने पर फर्जी होने के कारण सारे चेक बाउंस हो गए। वीके शर्मा के सारे राजफाश खुले। उन्होंने सारा दोष बैंक के मैनेजर आरके नागपाल निवासी अलीगढ़ पर लगा दिया और दोषी मानते हुए बर्खास्त कर दिया। तत्कालीन नोबेल बैंक के मैनेजर आरके नागपाल ने अपने लिखित बयान में बताया कि जो भी बैंक की गतिविधि व सारे कार्य वीके शर्मा के कहने पर किए जाते थे।