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भीड़ सबके साथ पर वोटर किसके हाथ

Fri, 07 Oct 2016 02:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 सहारनपुर में पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फिर बसपा सुप्रीमो मायावती और अब रालोद की बड़ौत रैली में भारी भीड़ उमड़ी। इसी तरह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के रोड शो में भी अच्छी-खासी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। यही नहीं, मुजफ्फरनगर में पूर्व सांसद संजय चौहान की स्मृति में हुए कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पहुंचे तो उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ी। ऐसे में सियासी गलियारों जनता के मूड को लेकर चर्चा तेज है।
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फिलहाल, यह भीड़ वोट में कितनी तब्दील होगी, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन, बड़ौत रैली की भीड़ से रालोद नेता उत्साहित हैं। ऐसा ही उत्साह मोदी की रैली के बाद भाजपा और मायावती की रैली के बाद बसपा नेताओं में दिखा था। सभी दलों के कयास और उत्साहजनक नतीजों की उम्मीद के बीच यह भी कहा जा रहा है कि वोटर अभी अपने-अपने तरीके से हर दल को परख रहा है। वह अभी से किसी निर्णय पर पहुंचने की जल्दबाजी में नहीं है। ऐसे में जाहिर है कि विधानसभा चुनाव करीब आने के बाद ही स्थिति साफ होने की उम्मीद कर सकते हैं।
रालोद की बड़ौत में हुई स्वाभिमान रैली को पार्टी समर्थक संजीवनी के रूप में देख रहे हैं। रैली में दिग्गज नेता पहुंचे तो भीड़ भी उसी अंदाज में मौजूद रही। भारी भीड़ के सामने जब जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया गया तो भीड़ पूरे उत्साह में नजर आई। रालोद के वरिष्ठ नेताओं ने इसे नए युग के आगाज का संकेत बताया। रालोद की रैली पर दूसरे दलों की भी निगाह लगी थी। अब खास बात यह है कि सरकार के दो साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहारनपुर में विशाल जनसमूह को संबोधित किया था।
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मोदी को देखने और सुनने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। भीड़ को देखकर भाजपाइयों ने लोकसभा चुनाव के करिश्मे को विधानसभा चुनाव तक चलने का एलान कर दिया था। पार्टी नेताओं ने पश्चिम के जिलों में यह संदेश भी पहुंचाया। इसके बाद बारी बसपा सुप्रीमो मायावती की रही। उन्होंने सहारनपुर में उसी मैदान में अपनी ताकत का अहसास कराया। एक तरह से मायावती ने बसपा की विधानसभा चुनाव की तैयारियों का अंदाजा दूसरे दलों को करा दिया। इस रैली में भी भीड़ को देखकर सियासी पंडित असमंजस में पड़ गए। सपा भी शक्ति प्रदर्शन में पीछे नहीं रही। अगस्त में मुजफ्फरनगर में हुए कार्यक्रम को रैली जैसा रूप दिया गया। इसमें भी अखिलेश को देखने के लिए युवाओं में काफी उत्साह था। पश्चिम में हुए इस कार्यक्रम की सफलता से सपाई गदगद नजर आए थे।
चार अक्तूबर को बड़ौत में रालोद ने माहरैली का आयोजन किया तो पश्चिम के जिलों में ही राहुल भी रोड शो कर रहे थे। रालोद की महारैली में जहां रिकार्ड भीड़ आई तो वहीं राहुल से संवाद करने को आतुर लोगों का उत्साह भी कम नहीं रहा। बृहस्पतिवार को मेरठ में रोड शो में भी लोग राहुल को देखने के लिए उमड़ पड़े। अपनी जमीन खो चुकी रालोद ने इसे नई उम्मीद की संज्ञा दी तो कांग्रेस का मानना है कि राहुल के करिश्मे के कारण वह पश्चिम में मजबूत ताकत बनकर उभरेगी। ऐसे में अहम सवाल यह है कि रैलियों या रोड शो में उमड़ने वाली इस भीड़ का आशय क्या है। क्या जनता भी अलग-अलग कार्यक्रमों में जाकर नेताओं को परख रही है। क्या यह जनता का टेस्ट है, जिसमें पास होने वाले को ही वह अपना वोट देगी। सियासत से जुड़े लोगों का कहना है कि अभी वोटर अपना मन बनाने के लिए सभी को परख रहा है। ऐसे में यह देखना होगा कि इस भीड़ को वोट में बदलने का किस पार्टी का हुनर काम आएगा।
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