चुनावी महासमर में भाजपा की एकतरफा जीत में अति पिछड़ी जातियों का अंडर करंट अहम साबित हुआ है। सपा जहां इस वर्ग को साध नहीं पाई तो बसपा यह भांप ही नहीं पाई कि ये मतदाता एकतरफा भाजपा के पाले में जा रहे हैं। इस वर्ग ने खासतौर में वेस्ट यूपी में भाजपा की जीत का ऐसा आधार तैयार कर दिया कि भाजपा जीत के ट्रैक पर बढ़ती चली गई। सूबे का सामाजिक ताना-बाना इस तरह बुना गया है कि सभी दल अपने-अपने जातिगत समीकरणों को साधते हुए सियासी रण में उतरते हैं। सूबे में अपर कास्ट 20, अनुसूचित जाति 24 और अल्पसंख्यक वोट 14 प्रतिशत हैं। लेकिन, वेस्ट यूपी की सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिशत 20 से 40 के आसपास है। अति पिछड़ा वर्ग यहां लगभग 33 फीसदी है। पूरे प्रदेश में जहां निषाद, मछुआरा, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, कुर्मी, पटेल आदि हैं, तो वेस्ट यूपी में पाल, प्रजापति, विश्वकर्मा, लुहार, सैनी, कश्यप, धींवर, खटीक, वाल्मीकि आदि का ही वोट 20 प्रतिशत के पार है। इस तरह हर सीट पर इनका जबरदस्त दखल है।
सपा ने अन्य पिछड़ा वर्ग को साधने में तो पूरी ताकत लगा दी। लेकिन, अति पिछड़ा वर्ग को नहीं साध पाई। ओबीसी कोटे में तो सात बड़े मंत्री दे दिए गए, लेकिन अति पिछड़ों को नजरअंदाज ही किया गया। खासतौर पर वेस्ट यूपी में कम ही नजर रखी। अहम बात यह रही कि यादव, जाट आदि पिछड़े वर्ग के नेताओं को मंत्री पद बांटकर सपा ने अति पिछड़ा वर्ग को और नाराज कर दिया। लोकसभा चुनाव से लगातार अति पिछड़ा भाजपा के साथ चल रहा था। सपा ने फोकस करने की जहमत भी नहीं उठाई। जहां-जहां भी सपा के सम्मेलन हुए, वहां मुस्लिम और पिछड़े वर्ग को फोकस किया गया। बसपा की रैलियों में दलित और मुस्लिम पर जोर रहा। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में अति पिछड़ा वर्ग पर फोकस किया गया। खासतौर पर मेरठ से पीएम ने रैली की शुरुआत की थी तो यहां भी इस वर्ग पर फोकस था। उधर, मायावती ने भी यहीं अपनी चुनावी रैली का आगाज किया था। लेकिन, उनका फोकस भी दलित, मुस्लिम और सोशल इंजीनियरिंग पर ही रहा। अति पिछड़ा वर्ग पर फोकस करने में लापरवाही की गई।
सबने छोड़ा तो भाजपा ने साधा
कांग्रेस ने जरूर इस वर्ग को साधने की कोशिश की। मिस्त्री और खत्री के सहारे इस वर्ग को लुभाने की कोशिश की। लेकिन यह काम ही नहीं आया। यह केमिस्ट्री फेल हो गई। उधर, भाजपा ने स्वतंत्र देव सिंह (कुर्मी), धर्मपाल सिंह (लोधी), प्रकाश पाल (बघेल) और केशव प्रसाद मौर्य को आगे कर एवं बार-बार उनका नाम आगे लाकर इस वर्ग को साधने में सफलता पा ली। बसपा ने भी इस वर्ग पर दांव नहीं चला। स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से रही सही कसर भी पूरी हो गई।
लोकसभा से मिली थी मजबूती
लोकसभा चुनाव से अति पिछड़ा वर्ग पूरी मुस्तैदी से भाजपा के साथ जमा है। मेरठ और आसपास की 34 सीटों पर 10 से 22 प्रतिशत वोटों की उनकी यह उपस्थिति भाजपा को पूरी तरह मजबूत कर गई। मेरठ की छह सीटों पर इस वर्ग ने भाजपा को एकतरफा वोट किया। खासतौर पर दक्षिण, सिवालखास, हस्तिनापुर, किठौर और सरधना सीट पर अति पिछड़ों के वोट में भाजपा के अलावा अन्य दल सही सेंध नहीं लगा पाए। बिजनौर, शामली, बागपत, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में भी यही स्थिति रही। प्रत्याशियों का लगातार इस वर्ग पर टारगेट करना भी भाजपा के इस परिणाम का कारण रहा।