मोदीपुरम। चर्चित स्मिता भादुड़ी फर्जी एनकाउंटर केस में सीबीआई कोर्ट सोमवार (आज) फैसला सुनाएगी। 15 साल से इंसाफ की राह देख रहे स्मिता के पिता का कहना है कि बेटी तो चली गई, अब कोर्ट दोषियों को जो भी सजा देगी, मंजूर है। मेरी बेटी के साथ न्याय होना चाहिए। दोषियों को फांसी तो मिलने से रही, कम से कम उम्रकैद तो होनी चाहिए।
यह था मामला
14 जनवरी 2000 की शाम दौराला के जंगल में थाना दौराला के तत्कालीन इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, सिपाही सुरेंद्र और भगवान सहाय ने फर्जी मुठभेड़ में मेरठ कॉलेज की स्नातक की छात्रा पल्लवपुरम निवासी स्मिता पुत्री एसके भादुड़ी को मार डाला था।
स्मिता उस दौरान अपने दोस्त शास्त्रीनगर निवासी मोहित त्यागी के साथ कार से लौट रही थी। लंबे समय बाद सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने विगत 10 दिसंबर को तीनों पुलिस कर्मियों को दोषी करार दिया था। जबकि सजा सुनाए जाने का निर्णय 14 दिसंबर (सोमवार) के लिए सुरक्षित रख लिया था। बता दें कि दोषी अरुण कौशिक वर्तमान में डीएसपी पद से रिटायर हो चुके हैं।
अब जो सजा मिले, ठीक
स्मिता के पिता एसके भादुड़ी ने रविवार को बातचीत में कहा कि इस दिन के इंतजार में पंद्रह साल बीत चुके है। हालांकि अब सजा का कोई औचित्य नहीं रह जाता, लेकिन कोर्ट जो फैसला देगी, उसे ही माना जाएगा। वैसे भी पंद्रह साल से तो हम सजा ही काट रहे है। पहले बेटी गई और उसके गम में पत्नी भी साथ छोड़ गई। इकलौते बेटे सुप्रियो के सहारे जिंदगी कट रही है।
उससे किसी की क्या दुश्मनी
एसके भादुड़ी बोले कि मेरी बेटी स्मिता की किसी से क्या दुश्मनी थी। निर्दोष स्मिता को मौत के घाट उतार दिया गया। इस चक्रव्यूह में पुलिस तो मोहरा बनाई गई, लेकिन पूरी कहानी के पीछे कोई और है। गाजियाबाद जाने के सवाल पर एसके भादुड़ी ने कहा कि मेरे जाने या न जाने से क्या फर्क पड़ता है।
फैसला तो आना ही है। घर पर बैठने से भी क्या होगा। जो जीवन चल रहा है, उसे ही आगे बढ़ाया जाएगा। मैं रूटीन की तरह अपनी ड्यूटी पर जाऊंगा। अब कोर्ट जो भी अपना फैसला सुनाएगी, उसके बारे में जानकारी मिल ही जाएगी।
चर्चित रहा था फर्जी एनकाउंटर
15 साल पहले हुए इस फर्जी एनकाउंटर की गूंज मेरठ ही नहीं, आसपास के जनपदों में भी रही थी। पुलिस की विवेक शून्यता और बेहद जल्दबाजी में उठाए गए घोर लापरवाही भरे इस कदम से हंसता-खेलता परिवार बिखर गया था।
इंस्पेक्टर अरुण कौशिक और एक सिपाही ने सरकारी असलहे से ताबड़तोड़ 11 गोलियां चलाई थीं। बाद में जब इन पुलिसकर्मियों को पता चला था कि उनकी इस ‘बहादुरी’ से एक निर्दोष और होनहार छात्रा की बलि चढ़ गई है तो उनके होश उड़ गए थे।