जिला पंचायत की सियासत करवट लेती नजर आ रही है। 17 सितंबर को स्थगित बोर्ड बैठक को जिला पंचायत अध्यक्ष शनिवार को भले ही अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब हो गई हों, लेकिन यह साफ हो गया है कि अपने ही समर्थकों पर उनकी सियासी पकड़ कमजोर पड़ गई है। उन्हें वोट करने वाले सदस्यों के ही बोर्ड से किनारा करने से जिला पंचायत में भविष्य की सियासत को लेकर चर्चाओं का दौर चल पड़ा है। हालांकि, सपा के शीर्ष नेतृत्व में चल रहे घमासान और सियासी गुटबंदी का भी इसका एक कारण बताई जा रही है।
समाजवादी छात्र सभा से जुड़कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की करीबी टीम में पहुंचे अतुल प्रधान का कद काफी बढ़ चुका था। यही कारण रहा कि जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में वह कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर को भी झटका देने में कामयाब रहे और उनके पुत्र नवाजिश मंजूर की दावेदारी खारिज कराकर अपनी पत्नी सीमा प्रधान को जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए न सिर्फ प्रत्याशी बनवाया, बल्कि निर्वाचित कराने में भी कामयाब रहे। इसके बाद उनका कद और ज्यादा बढ़ गया। जिससे सपा के ही पुराने और वरिष्ठ नेताओं में बेचैनी बढ़ गई। वहीं जिला पंचायत बोर्ड में भी जिस तरह 14 मई की बैठक में हंगामा और बाहरी लोगों द्वारा विपक्षी सदस्यों के साथ हाथापाई की गई, उससे भी अलग संदेश गया। उधर, 17 सितंबर को जिला पंचायत की बोर्ड बैठक अध्यक्ष के आवास पर बुलाई गई तो उसमें मात्र एक ही सदस्य मौजूद रहे। हालांकि, उस दिन अतुल प्रधान लखनऊ में चल रहे सपा के अंदरूनी सियासी रण में शामिल थे। ऐसे में बैठक स्थगित कर दी गई और 24 सितंबर को बैठक बुलाई गई। इस बैठक में भी जिला पंचायत के मात्र दो ही सदस्य उपस्थित हुए, बावजूद इसके नियमों के हेरफेर में बैठक करा दी गई। अब इस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। वर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष की अपने ही सदस्यों पर पकड़ कमजोर नजर आ रही है। अब मात्र दो सदस्यों का ही नजर आना आगामी सियासी दृष्टिकोण से ठीक नहीं। हालांकि, नवाजिश तो केवल जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर उनके पक्ष में वोट ही करने आए थे। बाकी बैठकों में वह नहीं आए पर बाकी का भी किनारा निश्चित रूप से सवाल खड़े कर रहा है। अब भविष्य में वह इसकी भरपाई कर कैसे कर पाते हैं, सबकी नजर इसी पर लगी है।